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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 17, Verses 1–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 17, verses 1–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 1-3

संस्कृत श्लोक

श्रीसरस्वत्युवाच । शवीभूतमिमं वत्से भर्तारं पुष्पपुञ्जके । आच्छाद्य स्थापयैनं त्वं पुनर्भर्तारमेप्यसि ॥ १ ॥ पुष्पाणि म्लानिमेष्यन्ति नो नचैष विनङ्क्ष्यति । भूयश्च तव भर्तृत्वमचिरेण करिष्यति ॥ २ ॥ एतदीयश्च जीवोऽसावाकाशविशदस्तव । न निर्गमिष्यति क्षिप्रमितोऽन्तःपुरमण्डपात् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

सरस्वती ने कहा : वत्से, अपने पति के शव को फूलों के ढेर में छिपाकर रक्खो | ऐसा करने से फिर तुम इस पतिको प्राप्त करोगी । न तो फूल ही मुझयिंगे ओर न तुम्हारे पतिका यह शव ही विनष्ट होगा याने सड़ेगा या सूखेगा । फिर यहाँ थोड़े दिनों में तुम्हारा स्वामी बन जायेगा ओर इसका जीव, जो कि आकाश की नाई निर्मल है, तुम्हारे अन्तःपुरके प्रासाद से शीघ्र बाहर नहीं निकलेगा

सर्ग सन्दर्भ

सोलहवाँ सर्ग समाप्त सत्रहवाँ सर्ग अन्वय ओर व्यतिरेक द्वारा नूतन वर्तमान ओर प्राक्तन पूर्वजन्म की सृष्ट्यां की, केवल मनोविलास होने से, तुल्यता का प्रतिपादन |