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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 17, Verses 5–8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 17, verses 5–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 5-8

संस्कृत श्लोक

पतिं संस्थाप्य तत्रैव पुष्पपूरप्रगोपितम् । किंचिदाश्वासिताऽतिष्ठद्दरिद्रेव निधानिनी ॥ ५ ॥ तस्मिन्नेव दिने सैषा तस्मिञ्छुद्धान्तमण्डपे । अर्धरात्रे परिजने सर्वस्मिन्निद्रया हृते ॥ ६ ॥ ज्ञप्तिं भगवतीं देवीं शुद्धध्यानमहाधिया । दुःखादाह्वाययामास सोवाच समुपेत्य ताम् ॥ ७ ॥ किं स्मृतास्मि त्वया वत्से धत्से किमिति शोकिताम् । संसारभ्रान्तयो भान्ति मृगतृष्णाम्बुवत्तधा ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

फूलों के ढेर में प्रच्छन्न अपने पति के शव को अन्तःपुर में ही रखकर कुछ धैर्य को प्राप्त हुई रानी लीला निधि से युक्त होने पर भी निधिके अपने उपयोग में न आने के कारण भोग, ऐश्वर्य से वंचित दरिद्रा-सी रही । भाव यह कि निधि के रहनेपर भी कारणवश उसके उपयोग में न आने के कारण जैसे निधानिनी दरिद्रा (भोगैश्वर्य से वंचित) रहती है, वैसे ही पति के रहने पर भी निश्चेष्ट होने के कारण उपयोग में न आने से वह भोगैश्वर्य से वंचित रही। लीला ने मारे क्लेश के उसी दिन अर्धरात्रि में, जबकि सभी परिजन घोर निद्रा में सोये थे, उसी अन्तःपुर के प्रासाद में शुद्ध ध्यान से युक्त अन्तःकरण से ज्ञानरूपिणी सरस्वती देवी का आवाहन किया । देवी ने उसके पास आकर उससे कहा : वत्से, तुमने मेरा स्मरण क्यों किया और क्यों तुम इतनी शोकाकुल हो रही हो ? दुःख के कारण ये संसाररूपी भ्रम, मृगतृष्णा में जल की नाई, मिथ्या ही प्रतीत होते हैं, यानी जैसे मृगतृष्णामें जलप्रतीति मिथ्या हे, वैसे ही ये दुःखजनक संसाररूपी भ्रम मिथ्या हैं