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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 17, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 17, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

अत्यन्ताभावसंपत्त्या जगतश्चैतदाप्यते । नान्यथा मद्वरेणाशु त्वं तु प्राप्स्यसि सुन्दरि ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

उसकी प्राप्ति कैसे होती है ? ऐसी आशंका होने पर उसकी प्राप्तिका उपाय बतलाती हैं । हे सुन्दरी, उक्त तत्त्व यद्यपि जगत्‌के अत्यन्त अभाव की प्रतीति से (& ) ही प्राप्त होता है, अन्यथा प्राप्त नहीं होता, क्योकि “नान्य पन्था विद्यतेऽयनाय” ऐसी श्रुति है । फिर भी तुम मेरे वरसे उसे शीघ्र प्राप्त हो जाओगी