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Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker) · Sarga 13

बारहवाँ सर्ग समाप्त तेरहवाँ सर्ग जीवनमुक्तिरूप फल के हेतु वैराग्य आदि गुणों का एवं शम का विशेषरूप से वर्णन ।

15 verse-groups

  1. Verses 1–3वैराग्य, शान्ति आदि साधनों का आगे वर्णन करनेवाले श्रीवसिष्ठजी इस समय प्रस्तुत जीवन्युक्ति…
  2. Verse 4वे अन्य लोगों की दृष्टि से आते है और जाते हैं पर अपनी दृष्टि से न आते हैं ओर न जाते हैं,…
  3. Verse 5क्योंकि “सचश्चुरवश्चुरिव सकर्णोऽकर्ण इव समना अमना इव“ (तत्वज्ञ पुरुष अन्य की दृष्टि में व…
  4. Verse 6सम्पूर्ण अभिलाषाओं से रहित शान्तिपूर्ण तथा ब्रह्माकारत्व को प्राप्त मन चन्द्रबिम्ब में बै…
  5. Verse 7विषयों का बार-बार स्मरण करना और विषयों की प्राप्ति में कुतूहल ही विक्षेप के हेतु हैं, उनक…
  6. Verses 8–9सुखरूपता को प्राप्त हुआ मन न तो मायिक विक्षेपों को करता है और न विक्षेपों की जननी वासना क…
  7. Verses 10–15आत्मा का साक्षात्कार करना चाहिए, इसके सिवा पुरूष का और कुछ कर्तव्य नहीं है । जिस अधिकारी…
  8. Verses 16–35हे रामजी, जो दुस्तर आपत्तियाँ हैं और जो अति नीच कुत्सित योनियाँ हैं वे सब, जैसे खदिर से क…
  9. Verses 36–43संसार के सिवा कोड अन्य स्थान ही नहीं है, फिर किसका अवलम्बन करके संसार में अरति करनी चाहिए…
  10. Verses 44–47देह, इन्द्रिय ओर विषय से शून्य केवलीभाव (अद्वैतभाव) में हेतु इस शास्त्र से क्या प्रयोजन ह…
  11. Verse 48उक्त सुख के प्राप्त होने पर भी फिर व्यवहार में प्रसक्ति होने पर वह नष्ट हो जायेगा, इस शंक…
  12. Verses 49–50मन के रहने पर चाह क्यो न होगी ? इस पर कहते हैं। प्रशान्त, अतिनिर्मल, विश्रान्ति-सुख से पू…
  13. Verses 51–62सर्ग की समाप्ति तक शम का वर्णन करने के लिए भूमिका बाँधते हैं । सुख की आशारूप तृषाताप के त…
  14. Verses 63–80हे रामचन्द्रजी, सम्पूर्ण आधि और व्याधियों से ग्रस्त ओर तृष्णारूपी रस्सी से आक्रान्त मन को…
  15. Verses 81–84लोक में सम्पूर्ण गुणों मे शम सर्वाधिक श्रेष्ठता से प्रसिद्ध है, ऐसा कहते हैं। तपसिवयों मे…