Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, Verses 81–84
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, verses 81–84 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 81-84
संस्कृत श्लोक
तपस्विषु बहुज्ञेषु याजकेषु नृपेषु च ।
बलवत्सु गुणाढ्येषु शमवानेव राजते ॥ ८१ ॥
शमसंसक्तमनसां महतां गुणशालिनाम् ।
उदेति निर्वृतिश्चित्ताज्ज्योत्स्नेव सितरोचिषः ॥ ८२ ॥
सीमान्तो गुणपूगानां पौरुषैकान्तभूषणम् ।
संकटेषु भयस्थाने शमः श्रीमान्विराजते ॥ ८३ ॥
शमममृतमहार्यमार्यगुप्तं परमवलम्ब्य परं पदं प्रयाताः ।
रघुतनय यथा महानुभावाः क्रममनुपालय सिद्धये तमेव ॥ ८४ ॥
हिन्दी अर्थ
लोक में सम्पूर्ण गुणों मे शम सर्वाधिक श्रेष्ठता से प्रसिद्ध है, ऐसा कहते हैं।
तपसिवयों में, विद्वानों में, यज्ञकर्ताओं में, राजाओं में, बलवान् पुरुषों में एवं अन्यान्य
प्रचुर गुणों से विभूषित लोगों मेँ शमयुक्त (शान्त) पुरुष ही अधिक शोभित होता है । जैसे
चन्द्रमा से चाँदनी उदित होती है वैसे ही जिन गुणशाली सज्जनं का चित्त शमपूर्ण हे, उनके
हृदय से आनन्द का स्रोत उद्भूत होता हे । सम्पूर्ण गुणों की अवधि (सीमा), पुरुषों का मुख्य
भूषण एवं सम्पूर्ण गुणों की सम्पत्ति से युक्त शम संकटों में और भयपूर्ण स्थानों मे भी विराजमान
रहता हे -संकट ओर भय से पुरुष को मुक्त कर देता हे रघुनन्दन, दूसरों के द्वारा न चुराया
जा सकनेवाला तथा पूज्यजना द्वारा बड़ी सावधानता से सुरक्षित परम साधनभूत शमरूपी
अमृत के अवलम्बन से अनेक महानुभाव जिस क्रम से परम पद को प्राप्त हुए हैं, आप भी
सिद्धि के लिए उसी क्रम का अवलम्बन कीजिए