Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, Verses 8–9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, verses 8–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 8,9
संस्कृत श्लोक
न करोतीन्द्रजालानि नानुधावति वासनाम् ।
बालचापलमुत्सृज्य पूर्वमेव विराजते ॥ ८ ॥
एवंविधा हि वृत्तय आत्मतत्त्वावलोकनाल्लभ्यन्ते नान्यथा ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
सुखरूपता को प्राप्त हुआ मन न तो मायिक
विक्षेपों को करता है और न विक्षेपों की जननी वासना के प्रति दौड़ता है, किन्तु बालकों जैसी
भ्रममूलक चंचलता का त्याग कर अनादिसिद्ध आत्मसुखरूप हो विराजमान होता है । इस
प्रकार की स्थिति आत्मतत्त्व के साक्षात्कार से ही प्राप्त होती है, अन्य उपायों से नहीं