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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, Verses 44–47

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, verses 44–47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 44-47

संस्कृत श्लोक

क्षयित्वात्सर्वभावानां स्वर्गमानुष्ययोर्द्वयोः । सुखं नास्त्येव सलिलं मृगतृष्णास्विवैतयोः ॥ ४४ ॥ अतो मनोजयश्चिन्त्यः शमसंतोषसाधनः । अनन्तसमसंयोगस्तस्मादानन्द आप्यते ॥ ४५ ॥ तिष्ठता गच्छता चैव पतता भ्रमता तथा । रक्षसा दानवेनापि देवेन पुरुषेण वा ॥ ४६ ॥ मनः प्रशमनोद्भूत्तं तत्प्राप्यं परमं सुखम् । विकासिशमपुष्पस्य विवेकोच्चतरोः फलम् ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

देह, इन्द्रिय ओर विषय से शून्य केवलीभाव (अद्वैतभाव) में हेतु इस शास्त्र से क्या प्रयोजन है, देह आदि के रहने पर ही दूसरे उपायों से भी स्वर्गादियुख हो सकता है, ऐसी शंका कर कहते हैं । विनाशरहित, किसी प्रकारकी अशुभ आशंका से रहित, स्वस्थतायुक्त एवं विशिष्ट भ्रम से रहित सुख केवलीभाव के बिना तीनों भुवनो में कहीं नहीं है स्वर्ग आदि विनाशी है, उनमें पतन की शंका सदा बनी रहती है और दूसरे के उत्कर्ष मेँ चित्त अस्वस्थ भी बना रहता है, इसलिए केवली भाव ही पुरुषार्थ है। प्रवृत्ति होने पर केवलीभावकी प्राप्ति होती है। केवलीभाव की प्राप्ति होने पर क्लेश नहीं होता । न धनसम्पत्ति उपकार करती है, न मित्र उपकार करते हैं और न बन्धुबान्धव ही उपकार करते हैं। न प्रणाम आदि, न तीर्थयात्रा आदि, न उपवास, तीर्थवास उपकार करते हैं, केवल एकमात्र श्रवण, मनन तथा निदिध्यासनरूप पुरुषप्रयत्न से एवं द्वैतवासनाविरोधी ब्रह्माकार दृढ़वासना के तुल्य विषयवाले कर्म से साध्य साक्षात्कार से हुए केवल मनोमात्ररूप द्वैतके मूलोच्छेदरूप जय से वह पद प्राप्त किया जाता हे देह, इन्द्रिय आदि से आत्मा का पृथक्करणरूप विवेकमात्र से प्राप्त होनेवाला एवं श्रवण, मनन, निदिध्यासन से असम्भावनादिका निराकरणरूप विचार और एकाग्रता से निश्चय करने के योग्य वह उत्तम पद विषयों का त्याग कर रहे पुरूष द्वारा प्राप्त किया जाता हे । सुखसेव्य आसन पर बैठे हुए और स्वयं उसका विचार कर रहे पुरुष को उक्त पद प्राप्त करके न तो शोक होता है और न फिर वह उत्पन्न ही होता है । उसको विद्धान्‌ लोग संसार में साररूप से प्रसिद्ध सुखों के आसारों का (वेगवती वृष्टियों का) मेघरूप परम अवधि कहते हैं और ध्यान करनेवालों में जिससे अत्युत्तम आनन्द रस का आविर्भाव होता है। - ऐसा परम रसायन कहते हैं ॥ ३ ७-४ ३॥ स्वर्ग और मनुष्यलोक में सम्पूर्ण भावों के विनाशशील होने से जैसे मृगतृष्णा में जल नहीं होता, वैसे इन दोनों में सुख है ही नहीं। इसलिए शान्ति ओर सन्तोष का एकमात्र साधन मन के विजय का विचार करना चाहिए । उससे परमात्मा में एकरसतारूप आनन्द प्राप्त होता है। राक्षस, दानव, देवता या मनुष्य को बैठते, चलते, गिरते, घूमते मन के विजय से उत्पन्न तथा प्रफुल्ल (विकसित) शमरूपी (शान्तिरूपी) पुष्पों से युक्त विवेकरूपी उत्कृष्ट वृक्ष का (कल्पवृक्ष का) फल (परम सुख) प्राप्त करना चाहिए