Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, Verses 51–62
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, verses 51–62 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 51-62
संस्कृत श्लोक
सुखदोषदशादीर्घा संसारमरुमण्डली ।
जन्तोः शीतलतामेति शीतरश्मेः समप्रभा ॥ ५१ ॥
शमेनासाद्यते श्रेयः शमो हि परमं पदम् ।
शमः शिवः शमः शान्ति शमो भ्रान्तिनिवारणम् ॥ ५२ ॥
पुंसः प्रशमतृप्तस्य शीतलाच्छतरात्मनः ।
शमभूषितचित्तस्य शत्रुरप्येति मित्रताम् ॥ ५३ ॥
शमचन्द्रमसा येषामाशयः समलंकृतः ।
क्षीरोदानामिवोदेति तेषां परमशुद्धता ॥ ५४ ॥
हृत्कुशेशयकोशेषु येषां शमकुशेशयम् ।
सतां विकसितं ते हि द्विहृत्पद्माः समा हरेः ॥ ५५ ॥
शमश्रीः शोभते येषां मुखेन्दावकलङ्किते ।
ते कुलीनेन्दवो वन्द्याः सौन्दर्यविजितेन्द्रियाः ॥ ५६ ॥
त्रैलोक्योदरवर्तिन्यो नानन्दाय तथा श्रियः ।
साम्राज्यसंपत्प्रतिमा यथा शमविभूतयः ॥ ५७ ॥
यानि दुःखानि या तृष्णा दुःसहा ये दुराधयः ।
तत्सर्वं शान्तचेतःसु तमोऽर्केष्विव नश्यति ॥ ५८ ॥
मनो हि सर्वभूतानां प्रसादमधिगच्छति ।
न तथेन्दोर्यथा शान्ते जने जनितकौतुकम् ॥ ५९ ॥
शमशालिनि सौहार्दवति सर्वेषु जन्तुषु ।
सुजने परमं तत्त्वं स्वयमेव प्रसीदति ॥ ६० ॥
मातरीव परं यान्ति विषमाणि मृदूनि च ।
विश्वासमिह भूतानि सर्वाणि शमशालिनि ॥ ६१ ॥
न रसायनपानेन न लक्ष्म्यालिङ्गनेन च ।
तथा सुखमवाप्नोति शमेनान्तर्यथा मनः ॥ ६२ ॥
हिन्दी अर्थ
सर्ग की समाप्ति तक शम का वर्णन करने के लिए भूमिका बाँधते हैं ।
सुख की आशारूप तृषाताप के तुल्य दोषदशा से दीर्घ संसाररूपी मरुमण्डली शम से
चन्द्रमा की प्रभा के समान शीतलता को प्राप्त होती है शम से कल्याण प्राप्त होता हे, शम
परम पद है, शम शिव है, शम भ्रान्ति का निरास है । शम से तृप्त, शीतल ओर निर्मल आत्मावाले
एवं शम से जिसका चित्त विभूषित है, उसका शत्रु भी मित्र बन जाता है । शमरूपी चन्द्रमा से
जिनका आशय अलंकृत है, क्षीरसागरों की नाई उनमें परमशुद्धता उत्पन्न होती है अर्थात्
जैसे क्षीरसागरों मे अतिशुभ्रता विराजमान रहती है वैसे ही उनमें शुद्धता का साम्राज्य रहता
है । जिन सज्जनं के हृदयरूपी कमलकोषो मे शमरूपी कमल विकसित हे, दो हदयकमलवाले
वे लोग भगवान् श्रीविष्णु के तुल्य हे । भाव यह कि विष्णु भगवान् का हृदयकमल ही बाहर ब्रह्मा
का आसन है, अतः वह दो प्रकार का है जिनके कलंकरहित मुखचन्द्र मेँ शम श्री शोभित
होती है, अपने सौन्दर्यरूप गुणों से जिन्होंने अन्य लोगों के नेत्र, मन आदि इन्द्र्यो अपने वश
में कर लीं है, वे कुलीनशिरोमणि हैं ओर वन्दनीय हैँ । तीनों लोकों के मध्य में स्थित राज्यलक्ष्मी
वैसे आनन्द के लिए नहीं होती जैसे कि (केवल आकार से ही) साग्राज्यसम्पत्ति के सदृश (न
कि अन्य गुणों से) शम- सम्पत्ति आनन्द के लिए होती हे । जो विविध दु:ख हैं, दुःसह तृष्णाएँ
है ओर दुष्ट मानसिक चिन्ताएँ हैं, वे सब शान्तचित्तवाले पुरुषों में इस प्रकार नाश को प्राप्त
होते हैं, जैसे कि अनेक सूर्यो के प्रकाश में अन्धकार विनष्ट हो जाता है । शान्त (शमवान)
पुरुष के दर्शन से सब प्राणियों का मन जैसी कोतुकपूर्णं प्रसन्नता को प्राप्त होता है, चन्द्रमा
के दर्शन से वैसी प्रसन्नता प्राप्त नहीं होती शान्तियुक्त और सब प्राणियों में प्रेम करनेवाले
सज्जनतम पुरुष में परम तत्त्व स्वयं ही (अनायास) प्रसन्नता को (निर्मलता को) प्राप्त होता
है । हे रामजी, जैसे प्राणियों का अपनी माता पर विश्वास होता, वैसे ही क्रूर, कुटिल ओर मृदु
सब प्राणियों का शमवान पुरुष पर विश्वास होता हे । पुरुष को इन्द्रपद प्राप्त होने पर अमृत के
पान से ओर भगवान् विष्णु का पद प्राप्त होने पर लक्ष्मी के आलिंगन से वेसा सुख प्राप्त नहीं
हो सकता, जैसा कि शम से अन्तःकरण में सुख प्राप्त होता हे