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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, Verses 49–50

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, verses 49–50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 49,50

संस्कृत श्लोक

मनःप्रशान्तमत्यच्छं विश्रान्तं विगतभ्रमम् । अनीहं विगताभीष्टं नाभिवाञ्छति नोज्झति ॥ ४९ ॥ मोक्षद्वारे द्वारपालानिमाञ्छ्रणु यथाक्रमम् । येषामेकतमासक्त्या मोक्षद्वारं प्रविश्यते ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

मन के रहने पर चाह क्यो न होगी ? इस पर कहते हैं। प्रशान्त, अतिनिर्मल, विश्रान्ति-सुख से पूर्ण, भ्रमरहित, स्पृहारहित और अभीष्टशून्य मन न तो किसी वस्तु की अभिलाषा करता है और न किसीका त्याग करता है । श्रीरामजी, पूर्वं मेँ उक्त भी इस समय विस्तारपूर्वक कहे जा रहे मोक्ष के द्वार-पर स्थित इन द्वारपालों को क्रमश: सुनिए, उनमें से एकपर भी आसक्ति होने से मोक्ष के द्वार में प्रवेश प्राप्त हो जाता है