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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

ये केचन समारम्भा याश्च काश्चन दृष्टयः । हेयोपादेयतस्तास्ताः क्षीयन्तेऽधिगते पदे ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

क्योंकि “सचश्चुरवश्चुरिव सकर्णोऽकर्ण इव समना अमना इव“ (तत्वज्ञ पुरुष अन्य की दृष्टि में वश्चुयुक्त होता हुआ भी अचक्षु के सदश है ओर अन्य की दृष्टि से क्णयुक्त होता हुआ भी कर्णरहित है, अन्य की ष्टि से मनयुक्त होता हुआ भी मन से रहित-सा है) ऐसी श्रुति है। हेय और उपादेय से जो कोई यज्ञ-याग आदि कार्य हैं और जो कोई प्रमाण, प्रमेय आदि व्यवहार हैं, वे सब परमतत्त्व के ज्ञात होने पर क्षीण हो जाते हैं