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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, Verses 16–35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, verses 16–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 16-33

संस्कृत श्लोक

आपदो या दुरुत्तारा याश्च तुच्छाः कुयोनयः । तास्ता मौर्ख्यात्प्रसूयन्ते खदिरादिव कण्टकाः ॥ १६ ॥ वरं शरावहस्तस्य चाण्डालागारवीथिषु । भिक्षार्थमटनं राम न मौर्ख्यहतजीवितम् ॥ १७ ॥ वरं घोरान्धकूपेषु कोटरेष्वेव भूरुहाम् । अन्धकीटत्वमेकान्ते न मौर्ख्यमतिदुःखदम् ॥ १८ ॥ इममालोकमासाद्य मोक्षोपायमयं जनः । अन्धतामेति न पुनः कश्चिन्मोहतमस्यपि ॥ १९ ॥ तावन्नयति संकोचं तृष्णा वै मानवाम्बुजम् । यावद्विवेकसूर्यस्य नोदिता विमला प्रभा ॥ २० ॥ संसारदुःखमोक्षार्थे मादृशैः सह बन्धुभिः । स्वरूपमात्मनो ज्ञात्वा गुरुशास्त्रप्रमाणतः ॥ २१ ॥ जीवन्मुक्ताश्चरन्तीह यथा हरिहरादयः । यथा ब्रह्मर्षयश्चान्ये तथा विहर राघव ॥ २२ ॥ अनन्तानीह दुःखानि सुखं तृणलवोपमम् । नातः सुखेषु बध्नीयाद्दृष्टिं दुःखानुबन्धिषु ॥ २३ ॥ यदनन्तमनायासं तत्पदं सारसिद्धये । साधनीयं प्रयत्नेन पुरुषेण विजानता ॥ २४ ॥ त एव पुरुषार्थस्य भाजनं पुरुषोत्तमाः । अनुत्तमपदालम्बि मनो येषां गतज्वरम् ॥ २५ ॥ संभोगाशनमात्रेण राज्यादिषु सुखेषु ये । संतुष्टा दुष्टमनसो विद्धि तानन्धदर्दुरान् ॥ २६ ॥ ये शठेषु दुरन्तेषु दुष्कृतारम्भशालिषु । द्विषत्सु मित्ररूपेषु भक्ता वै भोगभोगिषु ॥ २७ ॥ ते यान्ति दुर्गमाद्दुर्गं दुःखाद्दुःखं भयाद्भयम् । नरकान्नरकं मूढा मोहमन्थरबुद्धयः ॥ २८ ॥ परस्परविनाशोक्तेः श्रेयःस्थो न कदाचन । सुखदुःखदशे राम तडित्प्रसरभङ्गुरे ॥ २९ ॥ ये विरक्ता महात्मानः सुविविक्ता भवादृशाः । पुरुषान्विद्धि तान्वन्द्यान्भोगमोक्षैकभाजनान् ॥ ३० ॥ विवेकं परमाश्रित्य वैराग्याभ्यासयोगतः । संसारसरितं घोरामिमामापदमुत्तरेत् ॥ ३१ ॥ न स्वप्तव्यं च संसारमायास्विह विजानता । विषमूर्च्छनसंमोहदायिनीषु विवेकिना ॥ ३२ ॥ संसारमिममासाद्य यस्तिष्ठत्यवहेलया । ज्वलितस्य गृहस्योच्चैः शेते तार्णस्य संस्तरे ॥ ३३ ॥ यत्प्राप्य न निवर्तन्ते यदासाद्य न शोचति । तत्पदं शेमुषीलभ्यमस्त्येवात्र न संशयः ॥ ३४ ॥ नास्ति चेत्तद्विचारेण दोषः को भवतां भवेत् । अस्ति चेत्तत्समुत्तीर्णा भविष्यथ भवार्णवात् ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे रामजी, जो दुस्तर आपत्तियाँ हैं और जो अति नीच कुत्सित योनियाँ हैं वे सब, जैसे खदिर से कटि उत्पन्न होते हैँ वैसे ही, मूर्खता से पैदा होती हैं । मिट्टी के पात्र को (सकोरे को) हाथ में लेकर चाण्डालो की टोली में भीख माँगने के लिए दर-दर घूमना अच्छा है, पर मूर्खतापूर्ण जीवन अच्छा नहीं हे । निर्जन स्थान में, अति भयानक अन्ध कूप में एवं पेड़ों के खोखलों में अन्धा कीड़ा होना अच्छा है, पर अतिदुःखदायी मूर्खता अच्छी नहीं है । यह संसारी पुरुष मोक्ष के उपायभूत इस शास्त्ररूप प्रकाश को पाकर फिर मोहान्धकार में भी अन्धता को प्राप्त नहीं होता तभी तक तृष्णा मनुष्यरूपी कमल को संकुचित करती है जब तक विवेकरूपी सूर्य की निर्मल प्रभा का उदय नहीं होता। हे राघव, संसारदुःख से छुटकारा पाने के लिए मेरे सदुश आत्मीयो के साथ गुरुपदेश ओर शास्त्र के प्रमाण से अपने स्वरूप को जानकर जैसे इस संसार में जीवन्मुक्त हरि, हर आदि विचरण करते हैं और जैसे अन्यान्य जीवन्मुक्त महर्षि विचरण करते हैं वैसे ही आप भी विचरण कीजिए । हे रघुकुलतिलक, इस संसार में, अनन्त दुःख हैं, सुख तिनके के टुकड़े के बराबर बिलकुल ही नगण्य हैं, इसलिए दुःखों से सराबोर (परिपूर्ण) सुखो में कभी भी आदर नहीं करना चाहिए । ज्ञानवान्‌ पुरुष को पुरुषार्थ की सिद्धि के लिए जो वस्तु असीम ओर क्लेशलवविरहित है, उस ज्ञानरूप वस्तु को प्रयत्नपूर्वक प्राप्त करना चाहिए। हे रामजी, वे ही सज्जन परम पुरुषार्थ के भाजन हैं ओर वे ही पुरुष श्रेष्ठ हैं, जिनका सर्वोत्कृष्ट वस्तु में (परब्रह्म में) लीन मन परमशान्त है । जो दुरात्मा राज्य आदि सुखो में उत्तम भोगों के आस्वादमात्र से सन्तुष्ट हैं, उन्हें आप अन्धे मेढक समझिए । मेढक कुएँ में रहने से बाहर नहीं देख पाता, उसमें भी यदि अन्धा हो, तो कहाँ से देखेगा, यह भाव हे । जो लोग वंचक, प्रबल दुराचारियों, वैषयिक सुखो का भोग करनेवाले ओर मित्र जैसे दिखाई देनेवाले वास्तव में शत्रुओं पर आसक्त हैँ, वे लोग संकट से संकट को , दुःख से दुःख को, भय से भय को ओर नरक से नरक को प्राप्त होते हैं । वे लोग मूर्ख हैं और अज्ञान से उनकी बुद्धि मन्द पड गई हे । “सुख के पश्चात्‌ दुःख होता है और दुःख के पश्चात्‌ सुख होता है, घटीयन्त्र के समान लगातार भ्रमण कर रहा पुरूष पुन: पुनः सुख और दुःख को प्राप्त होता है” इत्यादि वाक्यों से सुख और दुःख की परस्पर विनाशिता कही गई है, अत: यह संसारी पुरुष कभी विश्रान्ति को प्राप्त नहीं होता | सुख और दुःख की अवस्था बिजली की चमक के समान क्षणभंगुर है । जो लोग आपके सदृश वैराग्ययुक्त, सम्यक्‌ विवेकी और महात्मा हैं, भोग और मोक्ष के एकमात्र भाजन वे पुरुष वन्दनीय हैं । परम विवेक का अवलम्बन कर वैराग्य और अभ्यास से आपत्तिरूप यह भीषण संसार नदी पार करनी चाहिए। विष के समान तीव्र मूर्छा देनेवाले इन मिथ्याभूत वंचनोपायों में नहीं सोना चहिए । इस संसार को प्राप्त कर जो पुरुष अवहेलना से रहता है वह जल रहे तृणमय घर के विस्तार में गहरी नींद सोता हे