Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, Verses 63–80
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 13, verses 63–80 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 63-80
संस्कृत श्लोक
सर्वाधिव्याधिचलितं क्रान्तं तृष्णावरत्रया ।
मनः शमामृतासेकैः समाश्वासय राघव ॥ ६३ ॥
यत्करोषि यदश्नासि शमशीतलया धिया ।
तत्रातिस्वदते स्वादु नेतरत्तात मानसे ॥ ६४ ॥
शमामृतरसाच्छन्नं मनो यामेति निर्वृतिम् ।
छिन्नान्यपि तयाङ्गानि मन्ये रोहन्ति राघव ॥ ६५ ॥
न पिशाचा न रक्षांसि न दैत्या न च शत्रवः ।
न च व्याघ्रभुजङ्गा वा द्विषन्ति शमशालिनम् ॥ ६६ ॥
सुसंनद्धसमस्ताङ्गं प्रशमामृतवर्मणा ।
वेधयन्ति न दुःखानि शरा वज्रशिलामिव ॥ ६७ ॥
न तथा शोभते राजा अप्यन्तःपुरसंस्थितः ।
समया स्वच्छया बुद्ध्या यथोपशमशीलया ॥ ६८ ॥
प्राणात्प्रियतरं दृष्ट्वा तुष्टिमेति न वै जनः ।
यामायाति जनः शान्तिमवलोक्य शमाशयम् ॥ ६९ ॥
समया शमशालिन्या वृत्त्या यः साधु वर्तते ।
अभिनन्दितया लोके जीवतीह स नेतरः ॥ ७० ॥
अनुद्धतमनाः शान्तः साधुः कर्म करोति यत् ।
तत्सर्वमभिनन्दन्ति तस्येमा भूतजातयः ॥ ७१ ॥
श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्त्वा घ्रात्वा शुभाशुभम् ।
न हृष्यति ग्लायति यः स शान्त इति कथ्यते ॥ ७२ ॥
यः समः सर्वभूतेषु भावि काङ्क्षति नोज्झति ।
जित्वेन्द्रियाणि यत्नेन स शान्त इति कथ्यते ॥ ७३ ॥
स्पृष्ट्वाऽवदातया बुद्ध्या यथैवान्तस्तथा बहिः ।
दृश्यन्ते यत्र कार्याणि स शान्त इति कथ्यते ॥ ७४ ॥
तुषारकरबिम्बाभं मनो यस्य निराकुलम् ।
मरणोत्सवयुद्धेषु स शान्त इति कथ्यते ॥ ७५ ॥
स्थितोऽपि न स्थित इव न हृष्यति न कुप्यति ।
यः सुषुप्तसमः स्वस्थः स शान्त इति कथ्यते ॥ ७६ ॥
अमृतस्यन्दसुभगा यस्य सर्वजनं प्रति ।
दृष्टिः प्रसरति प्रीता स शान्त इति कथ्यते ॥ ७७ ॥
योऽन्तः शीतलतां यातो यो भावेषु न मज्जति ।
व्यवहारी न संमूढः स शान्त इति कथ्यते ॥ ७८ ॥
अप्यापत्सु दुरन्तासु कल्पान्तेषु महत्स्वपि ।
तुच्छेऽहं न मनो यस्य स शान्त इति कथ्यते ॥ ७९ ॥
आकाशसदृशी यस्य पुंसः संव्यवहारिणः ।
कलङ्कमेति न मतिः स शान्त इति कथ्यते ॥ ८० ॥
हिन्दी अर्थ
हे रामचन्द्रजी, सम्पूर्ण आधि और व्याधियों से ग्रस्त ओर तृष्णारूपी रस्सी से आक्रान्त
मन को शमरूपी अमृत के सेको से प्रकृतिस्थ कीजिए । शम से शीतल बुद्धि से जो कुछ कार्य
करते हो, जो कुछ भोजन करते हो वह मन को अत्यन्त स्वादु लगता हे । उक्त बुद्धि से भिन्न
बुद्धि से जो कुछ कर्म किया जाता है एवं भोजन किया जाता है, वह स्वादु नहीं लगता हे । हे
रामचन्द्रजी, शमरूपी अमृतरस से आप्लावित मन ऐसे आनन्द को प्राप्त होता है कि उससे
कटे हुए अंग भी उग जाते हैं, ऐसा मेरा निश्चय हे । शमवान पुरुषका न पिशाच, न राक्षस, न
दैत्य, न शत्रु, न बाघ और साँप कोई भी द्वेष नहीं करते । जैसे बाण हीरे को नहीं छेद सकते,
वैसे ही उत्कृष्ट शमरूपी अमृतकवच से जिसके सम्पूर्ण अंग-प्रत्यंग सुरक्षित है, उसे सम्पूर्ण
दुःख पीड़ित नहीं कर सकते | अपने राजमहल में विराजमान राजाको भी वह शोभा प्राप्त नहीं
हो सकती, जो शोभा स्वच्छ और शम से शोभायमान समबुद्धि से युक्त पुरूष को प्राप्त होती
है। शान्त अन्त:करणवाले पुरुष का दर्शन कर मनुष्य को जो अलौकिक आनन्द होता है, वह
आनन्द अपने प्राणों से भी प्रियतरजन को देखकर नहीं होता | इस संसार में जो महात्मा शम
से शोभित एवं सब लोगों द्वारा प्रशंसित समवृत्ति से सबके साथ सुन्दर वर्ताव करता है, उसीका
जीवन सार्थक है, दूसरे का नहीं । शम से परिपूर्ण तथा उद्धतताशून्य मनवाला साधु पुरुष जो
कुछ भी कर्म करता है, ये सम्पूर्ण प्राणी उसके उस कर्म की प्रशंसा करते हैं । जो पुरुष प्रिय
ओर अप्रिय को सुनकर, छूकर, देखकर, खाकर और सूँघकर क्रमश: न तो प्रसन्न होता है
और न खिन्न होता है, वह शान्त कहा जाता है । जो पुरुष प्रयत्न से इन्द्रियो को जीतकर सब
प्राणियों में समान वर्ताव करता है ओर सुख आदि की न तो इच्छा करता है ओर न प्राप्त
प्रारब्ध का त्याग करता हे, वह शान्त कहा जाता हे । दूसरे लोगों की कुटिलता को जानकर भी
जिसमें बाहर-भीतर एक सी निर्मल बुद्धि से मोक्ष के उपायरूप कर्तव्य कार्य देखे जाते हैं, वह
शान्त कहा जाता हे । चन्द्रबिम्ब के समान कान्तिवाला जिसका मन मृत्यु, उत्सव ओर युद्ध में
क्रमशः भय, अनुराग और क्रोध से सन्तापरहित रहता है, वह शान्त कहा जाता है । हर्ष और
कोप के निमित्तवाले प्रदेशों मेँ स्थित भी जो पुरुष वहाँ स्थित न हुए के तुल्य न हर्ष को प्राप्त
होता है ओर न कोप करता है, किन्तु सुषुप्त पुरुष के समान स्वस्थ रहता हे, वह पुरुष शान्त
कहा जाता हे । जिसकी अमृत के झरने के समान सुखप्रद और प्रसन्न दृष्टि सब जन्तुओं के
ऊपर पडती है, वह शान्त कहलाता है अतिशीतल अन्तःकरणवाला जो पुरुष व्यवहार
करता हुआ भी सांसारिक विषयों मेँ आसक्त नहीं होता ओर मूढ नहीं हे, वह शान्त कहा जाता
हे । बड़ी-से-बड़ी आपत्तियो मे भी तथा दीर्घ कालतक रहनेवाले बड़े-बड़े प्रलय में भी जिसकी
नश्वर देह आदि में अहंबुद्धि नहीं होती, वह पुरुष शान्त कहा जाता हे । व्यवहार करते हुए भी
जिस पुरुष की ब्रह्म के समान समरस या आकाश के समान विकार को प्राप्त न होनेवाली बुद्धि
राग द्वेष आदि के सम्पर्क को प्राप्त नहीं होती, वह पुरुष शान्त कहा जाता हे