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Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 21

बीसवाँ सर्ग समाप्त इक्कीसवाँ सर्ग प्रत्यक्ष नरकसमूहमूत सम्पूर्ण अंगोवाली तथा मनुष्यों के नरकपतन की हेतु स्त्रियों की निन्दा |

27 verse-groups

  1. Verse 1जिन स्त्री-शरीरों में युवकों को रमणीयता की भ्रान्ति होती है, उनके स्वरूप को विवेचनपूर्वक…
  2. Verse 2उक्त अर्थ को ही विस्तार से विशद करते हुए पहले युवकों को जिन नेत्रों में छहावभावरूप विलास…
  3. Verse 3रत्री का शरीर क्या है, उसका कुछ अंश केश है, कुछ अंश रक्त है और कुछ अंश मांस आदि हैं, इन स…
  4. Verse 4हे बन्धुगण, बहुमूल्य वस्त्र ओर कस्तूरी, केसर आदि के लेप से (उबटन, तेल आदि के मर्दन से) जो…
  5. Verses 5–6जिस स्तनमण्डल पर सुमेरु पर्वत के शिखर से बहनेवाले गंगाजल के प्रवाह के सदुश मोतियों के हार…
  6. Verse 7जैसे वन में चरनेवाले गदहे या ऊँट के अंग रक्त, मांस और इड्डियों द्वारा बने हैं, वैसे ही स्…
  7. Verse 8केवल अविचार से ही लोगों ने स्त्री में रमणीयता की कल्पना कर रक्खी है, परन्तु मेरे मत से स्…
  8. Verse 9हे मुनीश्वर, मद से अनेक प्रकार का आनन्द देनेवाली और पतन, दंगा, फसाद आदि विविध अनर्थ कराने…
  9. Verse 10मुनिजी, ललनारूपी आलान में (हाथी को बाँधने के स्तम्भ में) मदरूपी मोह से सोये जैसे मनुष्यरू…
  10. Verse 11जैसे काजल को धारण करनेवाली अग्नि की ज्वाला, दाहक होने के कारण छूने के अयोग्य है ओर नेत्रो…
  11. Verse 12वासनाओं से पूर्णं होने के कारण आपाततः सरस मालूम पडनेवाली लेकिन वास्तव में तो नीरस यहाँ स्…
  12. Verses 13–14स्त्री लम्बी रात्रि के समान व्यर्थ है। जैसे रात्रि के चारों और व्याप्त अन्धकार ही केशों क…
  13. Verses 15–17स्त्री केवल पुरुषार्थ का ही नाश नहीं करती, किन्तु अनर्थकारिणी भी है, ऐसा कहते हैं। स्त्री…
  14. Verse 18हे मुनिश्रेष्ठ, कामरूपी व्याध ने मूढबुद्धि मनुष्यरूपी पक्षियों को फँसाने के लिए रत्रीरूपी…
  15. Verse 19स्त्रीरूपी विशाल आलान मेँ (हाथी को बोधने के खूँटे में) रतिरूपी (प्रेमरूपी) जंजीर से बधा ह…
  16. Verse 20दुष्ट वासनारूपी रस्सी से वेधी हुई स्त्री धनरूपी कीचड़ में विचरनेवाले संसाररूपी छोटे तालाब…
  17. Verse 21जैसे घोड़ों के लिए अश्वशाला बन्धन है, हाथियों के लिए आलान बन्धन है ओर साँपों के लिए मन्त्…
  18. Verse 22हे मुनिवर, विविध रसों से पूर्ण भोग की भूमि यह विचित्र पृथिवी स्त्रियों के ही सहारे दृढ़ स…
  19. Verses 23–24दुखःरूपी जंजीर से युक्त सम्पूर्ण दोषरूपी रत्नों की पेटी (सन्दूक) रूप स्त्री से मुझे कुछ भ…
  20. Verses 25–26रत्री के मांसमय स्तन, नेत्र, नितम्ब (कमर का पिछला उभरा हुआ भाग) ओर भौंह में मैं क्या करूँ…
  21. Verse 27ब्रह्मन्‌, प्रिया के जिस मुख में प्रियतम पति ने बड़े प्रेम से कपूर, कस्तूरी, गोरोचन, केसर…
  22. Verse 28उनके सिर के बाल राख से घूसर होने के कारण श्मशान के वृक्षों में चँवर जैसे मालूम पड़ते हैं…
  23. Verses 29–30उनके शरीर के रक्त को धूलि सुखाती है ओर मांसाहारी जीव भी झुण्ड के झुण्ड उनपर टूटते हैं, उन…
  24. Verse 31हे संसारस्थित लोगों, स्त्री के अंगों का थोड़े ही काल में होनेवाला यह परिणाम मैंने आप लोगो…
  25. Verses 32–34कान्तानुसारिणी (स्त्री के कारण होनेवाली) चिन्ता अनेक खट्टे (कुछ सुख से मिश्रित ऐहिक दुःख)…
  26. Verse 35जिसकी स्त्री है, उसको भोग की इच्छा होती है, जिसकी स्त्री नहीं है, उसे भोग की संभावना ही क…
  27. Verse 36ब्रह्मन्‌, आपाततः (विचार के बिना) भले प्रतीत होनेवाले, भँवरे के पंखों की जड के समान चंचल…