Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
यस्मिन्घनतरस्नेहं मुखे पत्राङ्कुराः स्त्रियः ।
कान्तेन रचिता ब्रह्मन्पीयते तेन जङ्गले ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मन्, प्रिया के जिस मुख में प्रियतम पति ने बड़े प्रेम से कपूर, कस्तूरी, गोरोचन,
केसर, चन्दन आदि से भाँति-भाँति के तिलक आदि बनाये थे, वही मुख थोड़े दिनों में निर्जन वन में
सूखता है