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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, Verses 15–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, verses 15–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 15-17

संस्कृत श्लोक

पुष्पाभिराममधुरा करपल्लवशालिनी । भ्रमराक्षिविलासाढ्या स्तनस्तबकधारिणी ॥ १५ ॥ पुष्पकेसरगौराङ्गी नरमारणतत्परा । ददात्युन्मत्तवैवश्यं कान्ता विषलता यथा ॥ १६ ॥ सत्कार्योच्छ्वासमात्रेण भुजङ्गदलनोत्कया । कान्तयोद्ध्रियते जन्तुः करभ्येवोरगो बिलात् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

स्त्री केवल पुरुषार्थ का ही नाश नहीं करती, किन्तु अनर्थकारिणी भी है, ऐसा कहते हैं। स्त्री विष की लता के समान युवावस्था से रसीली (लता के पक्ष में फूलों से मनोहर) हाथरूपी पत्तों से (कल्लों से) सुशोभित, भ्रमरूपी नेत्रों के हावभाव से पूर्ण, फूलों के गुच्छे रूपी स्तनो को धारण करनेवाली फूलों के केसर के समान गौर वर्णवाली मनुष्यों की हत्याके सदृश अधःपतन में तत्पर और कामोन्माद से अपना सेवन करनेवाले लोगों को मूर्छा, मरण आदि विवशता को प्राप्त कराती है। आशय यह है कि जैसे विष की लता फूलों से मनोहर लगती है, नये नये लाल पत्तों से शुभोभित रहती है, भँवरों से व्याप्त रहती है, फूलों के गुच्छों को धारण करती है, फूलों के केसर से पीतवर्ण हो जाती है, मनुष्यों को मार डालती है और जो लोग कामजनित उन्माद से उसका सेवन करते हैं उन्हे मूर्छा या मृत्यु के वश में कर देती है, वैसे ही स्त्री भी युवावस्था से रसीली, सुन्दर हाथों से सुशोभित, भवर की भाँति चंचल नयनों के कटाक्ष आदि से सम्पन्न, गुच्छों के समान मनोज्ञ स्तनों को धारण करनेवाली, फूलों के केसर के समान कांचनवर्णा, मनुष्यों के विनाश के लिए तत्पर है और स्वसेवियों को मूर्छा, मृत्यु आदि के वश में कर देती है। जैसे टुकड़े-टुकड़े करने की इच्छावाली रीछन (भालू की स्त्री) अपनी साँस से बिल में स्थित साँप को बिल से निकाल कर खा जाती है, वैसे ही लम्पट लोगों का धन और मन हरकर विनाश करने के लिए उत्कण्ठित स्त्री दिखावे के लिए किये गये मिथ्याभूत सत्कार द्वारा आश्वासन देकर मनुष्य को अपने वश में कर लेती है