Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, Verses 13–14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, verses 13–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 13 ,14
संस्कृत श्लोक
विकीर्णाकारकबरी तरत्तारकलोचना ।
पुर्णेन्दुबिम्बवदना कुसुमोत्करहासिनी ॥ १३ ॥
लीलाविलोलपुरुषा कार्यसंहारकारिणी ।
परं विमोहनं बुद्धेः कामिनी दीर्घयामिनी ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
स्त्री लम्बी रात्रि के समान व्यर्थ है। जैसे रात्रि के चारों और व्याप्त अन्धकार ही केशों का जूड़ा है,
चंचल तारे ही नेत्र हैं, पूर्ण चन्द्रबिम्ब ही मुख है, विकसित पुष्पराशि ही मन्द हास है, श्रृंगार आदि लीला
से उसमें पुरुष चंचल रहते हैं, सोये रहने के कारण धर्म, विवेक, वैराग्य आदि का विनाश होता है और
वह लोगों की बुद्धि को गाढ मोह में डालती है, वैसे ही स्त्री के भी चारों ओर बिखरे हुए अन्धकार के
समान श्याम केशों का जूड़ा रहता है, चंचल कनीनिकाओं से युक्त नेत्र होते हैं, पूर्ण चन्द्रमा के समान
आह्लादक होने से अपनी और आकृष्ट करनेवाला मुख रहता है, पुष्पराशि के समान विशद हास रहता
है, श्रृंगारादि की लीला से पुरुष उसमें विशेषरूप से आसक्त रहते हैं, वह धर्म विवेक, वैराग्य आदि
कार्यों की विघातक है और बुद्धि को मोहित करने में तो वह बेजोड हे, अतः सचमुच स्त्री लम्बी रात्रि के
समान केवल आयु का ही नाश करती है, उससे किसी प्रयोजन की सिद्धि नहीं होती