Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, Verses 29–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
पिबन्ति पांसवो रक्तं क्रव्यादाश्चाप्यनेकशः ।
चर्माणि च शिवा भुङ्क्ते खं यान्ति प्राणवायवः ॥ २९ ॥
इत्येषा ललनाङ्गानामचिरेणैव भाविनी ।
स्थितिर्मया वः कथिता किं भ्रान्तिमनुधावथ ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
उनके शरीर के रक्त को धूलि सुखाती है ओर मांसाहारी जीव भी झुण्ड के झुण्ड उनपर
टूटते हैं, उनके चाम को सियार नोच-नोचकर खाते हैं और उनका प्राणवायु आकाश में चला जाता
है