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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, Verses 23–24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, verses 23–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

सर्वेषां दोषरत्नानां सुसमुद्गिकयाऽनया । दुःखशृङ्खलया नित्यमलमस्तु मम स्त्रिया ॥ २३ ॥ किं स्तनेन किमक्ष्णा वा किं नितम्बेन किं भुवा । मांसमात्रैकसारेण करोम्यहमवस्तुना ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

दुखःरूपी जंजीर से युक्त सम्पूर्ण दोषरूपी रत्नों की पेटी (सन्दूक) रूप स्त्री से मुझे कुछ भी प्रयोजन नहीं है । सत्री दोषरूपी रत्नों को रखने के लिए सन्दूक है और दुःख उसमें ताला बन्द करने के लिए जंजीर है, अतएव दुःखमय और दोषमय रत्री की भला किस विवेकी को इच्छा होगी, यह भाव है