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Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 19

अठारहवाँ सर्ग समाप्त उन्‍नीसवाँ सर्ग अज्ञान, क्षुधा, पिपासा, रोग, अशौच और चपलता से दूषित जानवरों की-सी अवस्थावाली बाल्यावस्था की निन्दा ।

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  1. Verse 1देह की सभी अवस्थाएँ दुःखरूप नहीं हैं, क्योंकि उसकी बाल्यावस्था की सब लोग स्पृहा करते हैं,…
  2. Verse 2जिसकी पहले प्रतिज्ञा की थी, उसी अर्थ का विस्तार से वर्णन करते हैं। अशक्ति (असामर्थ्य), आप…
  3. Verse 3हाथियों के बन्धन-स्तम्भ के समान बाल्यावस्था अकारण क्रोध ओर रोदन से भीषण ओर दीनता से जर्जर…
  4. Verse 4जैसी पराधीनताप्रयुक्त चिन्ताएँ बाल्यावस्था में जीव के हृदय को पीडित करती हैं, वैसी मरण मे…
  5. Verse 5बाल्यावस्था में पशुपक्षियों की-सी चेष्टाएँ होती हैं, सभी लोग बालकों की भर्त्सना करते हैं,…
  6. Verse 6सामने स्थित प्रतिबिम्ब के समान बाल्यावस्था में स्फुट ओर निविड अज्ञान रहता है अथवा प्रत्ये…
  7. Verse 7बाल्यावस्था में अज्ञानवश जल, अग्नि और वायु से सदा उत्पन्न होनेवाले भय से पद-पद में जैसा द…
  8. Verse 8बालक बाल्यावस्था में निरन्तर विविध दुश्चेष्टाओं में-दुर्लीलाओं में, दुराशाओं में, दुरभिसन…
  9. Verse 9बाल्यावस्था में बालक तुच्छ कार्य को भी नन्हे बच्चे या निपट पागल के कहने- मात्र से बड़ा मह…
  10. Verse 10जैसे उल्लू दिन में अन्धकारमय गड़ढों में छिपे रहते हैं, वैसे ही जितने दोष, जितने दुराचार,…
  11. Verse 11ब्रह्मन्‌, बाल्यावस्था रमणीय (सुखमय) है, ऐसी जो लोग कल्पना करते हैं, वे सब दुर्बुद्धि हैं…
  12. Verses 12–13जिसमें हिंडोले के समान चंचल मन विविध विषयों के आकार को प्राप्त होता है, तीनों लोकों में अ…
  13. Verses 14–17मन स्वभावतः चंचल है ही और बाल्यावस्था सम्पूर्ण चंचल पदार्थों में सर्वश्रेष्ठ है। उन दोनों…
  14. Verses 18–19यदि बालक को प्रतिदिन मन को प्रसन्न करनेवाली नई-नई वस्तुएँ न मिले, तो वह विष के समान असह्य…
  15. Verse 20तपी हुई भूमि के ऊपर सदा भाप निकलती है, इधर उधर कीचड़ व्याप्त होता है ओर भीतर जल रहता है,…
  16. Verses 21–22मनुष्य सदा दूसरों से डरने और भोजन करनेवाले, दीन-हीन, दृष्ट ओर अदृष्ट सब वस्तुओं की इच्छा…
  17. Verse 23मुनिवर, बालक को दुष्ट चेष्टाओं या दुष्ट मनोरथो से उत्पन्न ओर भाँति भाँति के वंचना के उपाय…
  18. Verses 24–26बाल्यावस्था से बढ़कर दु:ख और किसी अवस्था या योनि में नहीं होते, यह आशय है। जैसे प्रखर ग्र…
  19. Verse 27किसी समय जब बालक भूख लगने से रोता है, तब तुम्हें खाने के लिए भुवन (लोक) दूँगी, यों माता य…
  20. Verse 28है महामते, बालक के मन में शीत और ताप का अनुभव तो होता है, पर वह उनका निवारण नहीं कर सकता,…
  21. Verse 29बालक सचमुच पक्षियों के सदृश हैं, जैसे भूखे पक्षी आकाश में बहुत ऊँचा उड़ने की इच्छा करते ह…
  22. Verse 30बाल्यावस्था में गुरुओं से, माता-पिता से, अन्यान्य जनों से एवं अपने से बड़े बालक से भय बना…
  23. Verse 31महामुने, सम्पूर्ण दोषपूर्ण दशाओं से दूषित किसी की रोकटोक के बिना स्वच्छन्द विहार करनेवाले…