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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 19, Verses 24–26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 19, verses 24–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 24-26

संस्कृत श्लोक

बालो बलवता स्वेन मनोरथविलासिना । मनसा तप्यते नित्यं ग्रीष्मेणेव वनस्थली ॥ २४ ॥ विद्यागृहगतो बालो परामेति कदर्थनाम् । आलान इव नागेन्द्रो विषवैषम्यभीषणाम् ॥ २५ ॥ नानामनोरथमयी मिथ्याकल्पितकल्पना । दुःखायात्यन्तदीर्घाय बालता पेलवाशया ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

बाल्यावस्था से बढ़कर दु:ख और किसी अवस्था या योनि में नहीं होते, यह आशय है। जैसे प्रखर ग्रीष्म ऋतु से वनभूमि सन्ताप को प्राप्त होती है, वैसे ही बालक भी मनोरथो के विलास से युक्त बलवान्‌ अपने मन से नित्य सन्ताप को प्राप्त होता है । बालक जब विद्यालय में पठने जाता है, तब उसे बन्धनस्तम्भ में वधे हुए हाथी के समान पराधीनता, बेंतों की मार आदि और भी बड़े बड़े भीषण कष्ट झेलने पड़ते हैं । बाल्यावस्था में असत्य पदार्थों में ही सत्यत्वबुद्धि होती है, अनेक प्रकार के मनोरथों का साम्राज्य छाया रहता है और हृदय बड़ा कोमल रहता है, अतएव बाल्यावस्था में अत्यन्त दीर्घ दुःख के सिवा सुख का लेश भी नहीं होता