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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 19, Verses 12–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 19, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 12,13

संस्कृत श्लोक

यत्र दोलाकृति मनः परिस्फुरति वृत्तिषु । त्रैलोक्याऽभव्यमपि तत्कथं भवति तुष्टये ॥ १२ ॥ सर्वेषामेव सत्त्वानां सर्वावस्थाभ्य एव हि । मनश्चञ्चलतामेति बाल्ये दशगुणं मुने ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसमें हिंडोले के समान चंचल मन विविध विषयों के आकार को प्राप्त होता है, तीनों लोकों में अत्यन्त अमंगल वह बाल्यावस्था किस प्रकार सुखकर हो सकती है ? मुनिवर, सम्पूर्ण प्राणियों की सभी अवस्थाओं की अपेक्षा बाल्यावस्था में मन दसगुना चंचल होता हे । मन की चंचलता का अधिक होना अधिक दुःख का हेतु है अर्थात्‌ जितना ही मन चंचल होगा, उतना ही अधिक कष्ट होगा, यह भाव हे