Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 19, Verses 14–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 19, verses 14–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 14-17
संस्कृत श्लोक
मनः प्रकृत्यैव चलं बाल्यं च चलतां वरम् ।
तयोः संश्लिष्यतोस्त्राता क इवान्तः कुचापले ॥ १४ ॥
स्त्रीलोचनैस्तडित्पुञ्जैर्ज्वलाजालैस्तरङ्गकैः ।
चापलं शिक्षितं ब्रह्मञ्छैशवाक्रान्तचेतसः ॥ १५ ॥
शैशवं च मनश्चैव सर्वास्वेव हि वृत्तिषु ।
भ्रातराविव लक्ष्येते सततं भङ्गुरस्थिती ॥ १६ ॥
सर्वाणि दुःखभूतानि सर्वे दोषा दुराधयः ।
बालमेवोपजीवन्ति श्रीमन्तमिव मानवाः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
मन स्वभावतः चंचल है ही और
बाल्यावस्था सम्पूर्ण चंचल पदार्थों में सर्वश्रेष्ठ है। उन दोनों का सम्बन्ध होने पर चंचलताप्रयुक्त
अनर्थ से बचानेवाला कौन है ? अर्थात् कोई नहीं है । ब्रह्मन्, बाल्यावस्था से आक्रान्त चित्त से युवतियों
के लोचनों ने, बिजलीने, अग्निकी ज्वालाओंने और तरंगों ने चंचलता सीखी है अर्थात् मन सम्पूर्ण
चंचल पदार्थो में सर्वश्रेष्ठ है । सभी व्यवहारों मे बाल्यावस्था ओर मन- ये दोनों सदा सहोदर भाई-से
प्रतीत होते हैं, ये दोनों चंचल हैं- दोनों की स्थिति क्षणिक है । दुःखपूर्ण सम्पूर्ण दुर्व्यसन, सम्पूर्ण दोष
और सम्पूर्ण मानसिक चिन्ता बाल्यावस्था में ही निवास करती हैं, जैसे कि मनुष्य धनवान् पुरुष के
आश्रय में रहते है