Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 19, Verses 21–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 19, verses 21–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 21,22
संस्कृत श्लोक
भयाहारपरं दीनं दृष्टादृष्टाभिलाषि च ।
लोलबुद्धि वपुर्धत्ते बाल्यं दुःखाय केवलम् ॥ २१ ॥
स्वसंकल्पाभिलषितान्भावानप्राप्य तप्तधीः ।
दुःखमेत्यबलो बालो विनिष्कृत्त इवाशये ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
मनुष्य सदा दूसरों से डरने और भोजन करनेवाले, दीन-हीन, दृष्ट ओर अदृष्ट सब वस्तुओं
की इच्छा करनेवाले एवं चंचल बुद्धि ओर शरीर से युक्त बाल्यकाल को केवल दुःख भोग के लिए धारण
करता है । विवश बालक जब अपने संकल्प से इच्छित पदार्थो को नहीं पाता, तब अत्यन्त सन्तप्त
होकर ऐसे दुःख को प्राप्त होता है कि मानों किसी ने उसके हृदय को काट डाला हो