Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 13
बारहवाँ सर्ग समाप्त तेरहवाँ सर्ग सब मूढ़ों को प्रिय और सदा भोगरूपी अनर्थ को देनेवाली लक्ष्मी की विविध दोषों द्वारा निन्दा ।
21 verse-groups
- Verse 1इस प्रकार विषयों की असारता का प्रतिपादन कर विषय-सम्पादन में हेतुभूत श्री-धनसम्पत्ति- भी अ…
- Verses 2–3विविध दुश्चेष्टाओं द्वारा उनकी वृद्धि होती हे
- Verse 4जैसे अज्ञान से आग को पैर से कुचल कर जली हुई कोई अभागिन एक जगह चरण नहीं रख सकती, किन्तु हा…
- Verse 5जैसे दिये की लो छूने से दाह उत्पन्न करती है ओर काजल को धारण करती है, वैसे ही यह श्री भी ज…
- Verse 6दुःख से उपार्जित भी यह मूढ श्री राजाओं की प्रकृति के समान गुण ओर अवगुण के विचार के बिना ह…
- Verse 7जिन कर्मो का फल धन, राज्यलाभ आदि ओर लोभ, हिंसा, मिथ्याभाषण आदि दोषरूप सर्पविष के वेगोके व…
- Verse 8तभी तक लोग अपने ओर पराये लोगों पर दया, दक्षिण्य, स्नेह आदि करते हैं, जब तक कि जैसे वायु स…
- Verse 9जैसे धूलि की मुडी मणियों को मलिन कर देती है, वैसे ही बड़े-बड़े विद्वान् शूरवीर, दूसरे के…
- Verse 10भगवन् सम्पत्ति की वृद्धि से दुःख ही होता है सुख नहीं होता अर्थात् जैसे विषलता केवल मृत्…
- Verse 11कोरई-कोई श्रीमान् लोग भी बड़े धार्मिक और यशस्वी देखे जाते हैं ऐसी परिस्थिति में श्री की…
- Verse 12हे मुनिवर, अज्ञ लोगों ने जिस श्री को सुख की हेतु समझ रक्खा है, वह दुःखरूप सर्पो की दुर्गम…
- Verse 13सत्कर्मरूपी कमल के लिए रात्रि हे । (जैसे रात्रि मेँ कमल संकुचित हो जाते हैं, वैसे ही श्री…
- Verse 14यह भय ओर भ्रान्तिरूपी मेघ के लिए पुरोवात (पूर्वी हवा) है, (जैसे पूर्वी हवा मेघ की वृद्धि…
- Verse 15वैराग्यरूपी लताओं के लिए तुषार है, काम आदि चित्तविकाररूपी उल्लुओं के लिए अंधेरी रात है, व…
- Verse 16यह श्री इन्द्रधनुष के समान चंचल (अचिरस्थायी) रंगों से मनोहर एवं बिजली के समान चपल और उत्प…
- Verse 17यह चपलता में जंगली नेवलियो से भी बढ़-चढ़कर है, दुष्कुल में सत्पनन हुई है, अच्छे कुल में स…
- Verse 18अतिचपल होने के कारण क्षण भर भी एक स्थान पर न रहनेवाली यह जलतरंग ओर दीपशिखा से (दिये की लौ…
- Verse 19यह युद्ध के लिए उत्सुक मनुष्यरूपी गजेन्द्रो का विनाश करनेवाली सिंहनी के समान है । बडी शीत…
- Verse 20मृत्यु द्वारा हरे गये लोगों को चाहनेवाली, अनेक मानसिक व्यथाओं से व्याप्त (अनेक मानसिक व्य…
- Verse 21जिस पुरूष की अलक्ष्मी द्वारा (सपत्नीरूप दरिद्रता द्वारा) स्वयं दूर निकाली गई चिरकाल तक सप…
- Verse 22यह लक्ष्मी मनोहर है, अतएव चित्तवृत्ति को अपनी ओर खींचती है, मरण, पतन आदि के कारण साहसिक क…