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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 13, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 13, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

जनयन्ती परं दाहं परामृष्टाङ्गिका सती । विनाशमेव धत्तेऽन्तर्दीपलेखेव कज्जलम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे दिये की लो छूने से दाह उत्पन्न करती है ओर काजल को धारण करती है, वैसे ही यह श्री भी जुआ, चोरी आदि से इसके कुछ हिस्से का क्षय होने पर श्रीमानों को सन्तप्त करती है ओर बीच मेँ ही (अनवसर में ही) अपना या अपने उपभोक्ता का नाश कर डालती है