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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 13, Verse 11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 13, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

श्रीमानजननिन्द्यश्च शूरश्चाप्यविकत्थनः । समदृष्टिः प्रभुश्चैव दुर्लभाः पुरुषास्त्रयः ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

कोरई-कोई श्रीमान्‌ लोग भी बड़े धार्मिक और यशस्वी देखे जाते हैं ऐसी परिस्थिति में श्री की प्राप्ति होने तक ही ग्रुणियों में गुण रहते हैं, यह कैसे कहा ? इस पर कहते हैँ । हे मुने, इस लोक में लोग जिसकी निन्दा नहीं करते ऐसा श्रीमान्‌, आत्मश्लाघा न करनेवाला शूरवीर पुरुष ओर सब पर समानभाव से दृष्टि रखनेवाला स्वामी ये तीन पुरुष दुर्लभ हैं, अर्थात्‌ श्रीमान्‌ की किसी न किरी तरह लोग अवश्य निन्दा करते है शूर अवश्य ही अपनी प्रशंसा करता है, निग्रह और अनुग्रह में समर्थ स्वामी सब पर समदृष्टि नहीं हो सकता