Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 13, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 13, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
दूरेणोत्सारिताऽलक्ष्म्या पुनरेव समादरात् ।
अहो बताश्लिष्यतीव निर्लज्जा दुर्जना सदा ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस पुरूष की अलक्ष्मी द्वारा
(सपत्नीरूप दरिद्रता द्वारा) स्वयं दूर निकाली गई चिरकाल तक सपत्नी द्वारा उपभुक्त उसी को फिर
आदर से आलिंगन सा करती है, यह बड़े खेद की बात है, यह मानवती नहीं है, किन्तु निर्लज्ज है ओर
इसकी दुष्टता कभी जाती नहीं