Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 13, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 13, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
सत्कार्यपद्मरजनी दुःखकैरवचन्द्रिका ।
सुदृष्टिदीपिकावात्या कल्लोलौघतरङ्गिणी ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
सत्कर्मरूपी कमल के लिए रात्रि हे । (जैसे रात्रि मेँ कमल संकुचित हो जाते हैं,
वैसे ही श्री प्राप्त होने पर सत्कर्मो का हास हो जाता है), दुःख रूपी कुँई (कमलिनी) के लिए चन्द्रिका
(चाँदनी) अर्थात् जैसे चाँदनी में कमलिनी (नीलोत्पल) विकसित होती है, वैसे ही श्री के प्राप्त होने पर
दुःखों का खूब विकास होता है और दयादृष्टिरूपी या परमार्थदृष्टिरूपी दीपक के लिए झकझोर वायु
और बड़ी-बड़ी तरंगों से युक्त नदी हैं । (जैसै झंझावात और तरंगों से युक्त नदी के झोकों से दीपक
बुझ जाता है, वैसे ही श्री की प्राप्ति होने पर दयादृष्टि या परमार्थदृष्टि बन्द हो जाती हे ।)