Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 13, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 13, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
चापलावजितारण्य नकुली नकुलीनजा ।
विप्रलम्भनतात्पर्यजितोग्रमृगतृष्णिका ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
यह चपलता में जंगली नेवलियो से भी बढ़-चढ़कर है, दुष्कुल में सत्पनन हुई है,
अच्छे कुल में सत्पनन नहीं है । वंचना में उग्र मृगतृष्णिका को जीतनेवाली है अर्थात् यह वंचना में इतनी
दक्ष हे कि वंचकतम मृगतष्णा को भी इसके सामने हार खानी पडी है