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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 95

चौरानबेवाँ सर्ग समाप्त पंचानबेवाँ सर्ग सत्यसंकल्पता की स्मृति से पुनः प्राणियों के साथ व्यवहार तथा अपने आकाशवसिष्ठ आदि नामों की प्राप्ति का वर्णन।

30 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, तदनन्तर उस समय पंचभूतों से रहित केवल चिदाकाश मा…
  2. Verse 2उस समय मुझे न तो सूर्य, चन्द्र, इन्द्र तथा हरि, हर आदि देख पाते थे और न सिद्ध, गन्धर्व, क…
  3. Verse 3मेँ पादन्यास, आरोहण आदि के द्वारा उनके ऊपर आक्रमण करता था, परन्तु वे मेरे ऊपर आक्रमण नहीं…
  4. Verses 4–5इसके अनन्तर मैने विचार किया कि हम तो सत्यकाम हैं, इसलिए मैने यह संकल्प किया किये देवगण मु…
  5. Verse 6इसके बाद हे श्रीरामचन्द्रजी, उन देवताओं के घरों में सर्वविध शंकाओं से शून्य चेष्टावाला तथ…
  6. Verse 7प्रसिद्ध कर दिया
  7. Verse 8मुझे आकाशवासी जिन महानुभावं ने आकाश में भगवान्‌ सूर्यदेव की किरणों से निकला हुआ देखा, उन्…
  8. Verse 9तथा मुझे आकाशवासी जिन सिद्धो ने वायुमण्डल से आविर्भूत हुआ देखा, उन लोगों के द्वारा मैं वा…
  9. Verse 10जिन मुनीश्वरों ने मुझे जल से आविर्भूत हुआ देखा उन्होंने मुझे “वारिवसिष्ठ" नाम से पुकारा ।…
  10. Verse 11तभी से मैं लोकों में कहीं पार्थिव, कहीं जलमय, कहीं तैजस और कहींपर मारुत-वसिष्ठ नाम से अन्…
  11. Verse 12इसके अनन्तर काल पाकर मेरे उसी सूक्ष्म शरीर से आधिभौतिकता प्रादुर्भूत हुई, जो चिरकाल के अभ…
  12. Verse 13तब अन्न ग्राणियों की नाई भौतिक देहवाले ही आप क्यों नहीं हुए, इस्रपर कहते है / चूँकि आतिवा…
  13. Verse 14इस तरह कहीं आकाशादि पंचभूतरूप से स्फुरित होने पर भी मैं चिदेकस्वभाव निराकार परम चिदाकाशरू…
  14. Verse 15वस्ुतः सदेह और विदेह गुक्‍्त- ये दोनों एक ही रूप के हैं; यह कहते हैं / जैसे जीवन्मुक्त तत…
  15. Verse 16ब्रह्म से अन्य दृष्टि का संभव न होने से वैसा व्यवहार करते रहने पर भी मेरी ब्रह्मता नष्ट न…
  16. Verse 17तब आपका यह कथन कैसे ठीक समझा जाय कि शून्य देह में आधिभोतिकता रूढ हुई. इस शकरा पर कहते हैं…
  17. Verse 18इसी तरह ब्रह्मा के शरीर तथा तत्कृत सर्ग जो जगत्‌ तथा अन्य लोगों को उदित हुए-जैसे अवभासित…
  18. Verse 19यह जो मैं आकाशवसिष्ठ हूँ, सो आज यहाँ अपने मन के अभ्यास से ही परिपुष्टता को मानों प्राप्त…
  19. Verse 20मेरी अपनी द्रष्ट से जैसे यह जगत्‌ ब्रह्माकाशात्मक हे केले ही हिरण्यगर्भ की अपनी द्ष्टि से…
  20. Verse 21जगत्‌ आदि सारी सृष्टि अपरिज्ञान के दोष से आप अज्ञजनों की दृष्टि में वज के तुल्य ऐसे ही दृ…
  21. Verse 22दूर गये हुए स्वजन में जैसे काल पाकर वासना कम हो जाने से स्नेह उपशान्त हो जाता है, वैसे ही…
  22. Verse 23ज्ञान होने पर अहंकाररूप स्थूलता सबकी ऐसे शान्त हो जाती है, जैसे कि भलीभाँति ज्ञात हो जाने…
  23. Verse 24ये समस्त दृश्यदृष्टियाँ भली भाँति ज्ञान हो जाने पर ऐसे बिलकुल शान्त हो जाती हैं, जैसे मरू…
  24. Verse 25महारामायण के सदृश शास्त्रों के एकमात्र अवलोकन से ही यह जीवन्मुक्तत्व सदा प्राप्त किया जा…
  25. Verse 26ससार मे अधिक आसक्ति के कारण जो अध्यात्मशा्तर से पराङ्न्लुख रहता है, उसकी निन्दा करते हैं…
  26. Verse 27जैसे अत्यन्त पवित्र हविः एरोडाशादिरुप ही अन्न देव, द्विज आदि खाते हैं तथा उच्छिष्ट, फुरीष…
  27. Verse 28एकमात्र महारामायण जैसे शास्त्रों के अवलोकन से ज्ञानियों को समस्त पदार्थों में हितसदृश सर्…
  28. Verse 29हे श्रीरामचन्द्रजी, शीतलचित्तता यानी चित्त का शीतल होना मोक्ष है तथा सन्तप्त चित्तता यानी…
  29. Verse 30यह प्राणी स्वभाव से ही विषयों के वशीभूत है । एकमात्र यही कारण है कि परस्पर युद्ध, चोरी, ह…
  30. Verse 31आनन्दधन पखह्ययरमात्मास्वरूप हो जाता है / श्रीवाल्मिकीजी ने कहा : मुनिजी के ऐसा कहने पर दि…