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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 95, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 95, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

परिज्ञातस्तु कालेन स्वल्पेनैवोपशाम्यति । वासनातानवात्स्नेहो बन्धौ दूरगते यथा ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

दूर गये हुए स्वजन में जैसे काल पाकर वासना कम हो जाने से स्नेह उपशान्त हो जाता है, वैसे ही हे श्रीरामचन्द्रजी, यथार्थ रूप में जब यह संसार खूब परिज्ञात हो जाता है तब यह थोड़े ही समय के बाद उपशान्त हो जाता है