Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 95, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 95, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
एवमात्म क्वचिद्व्योम कचनात्माप्यहं नभः ।
परमेव निराकारं युष्मास्वाकारवानपि ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह
कहीं आकाशादि पंचभूतरूप से स्फुरित होने पर भी मैं चिदेकस्वभाव निराकार परम चिदाकाशरूप
ही हूँ। (तब आप आकारबुक्त कैसे दिखाई देते है; इस आशंका पर कहते है) लेकिन आप लोगों
में उपदेशादि व्यवहार की सिद्धि के लिए आकारवान् भी मैं दीखता हूँ