Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 95, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 95, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
आकाशात्मान एवैते सर्व एव स्वयंभुवः ।
यथा त्वेतन्मनोमात्रमिमे सर्गास्तथैव हि ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
मेरी अपनी द्रष्ट से जैसे यह जगत् ब्रह्माकाशात्मक हे केले ही हिरण्यगर्भ की अपनी द्ष्टि से
भी यह जगत् बल्याकाशात्मक ही है यह कलते है/
मेरे ही समान ब्रह्मा की दृष्टि में आये जितने सर्ग हैं, वे सबके-सब ब्रह्माकाशात्मक ही हैं जैसे
स्वयं ब्रह्माजी मनोमात्र हैं वैसे ही उनकी सब सृष्टि भी है । अतः परीक्षकदृष्टि से यह सब जगत्
मनोमात्र ही हैं