Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 9
आठवाँ सर्ग समाप्त नौवोँ सर्ग चिति के अधीन जगत् का उदय, ध्वंस, सत्ता, स्फूर्तिं तथा परिवर्तन है ओर यह सारा विश्व चिन्मात्र चिति का स्फुरण है - यह वर्णन ।
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- Verse 1हिग्नीव कटकादित्वं संग्रारोदरकोटर: ' / विच्चमत्कार एवायमविकल्यन संक्षय: ॥ /नि.प्र. उत्त,…
- Verse 2नहीं हे, इससे कि अन्यत्र विषयों मेँ जाकर चैतन्य प्रदान कर सके । यदि वह चेतना सर्वगत मान ल…
- Verse 3इस तरह सम्पूर्ण द्ृश्यप्रपंच की देशतः स्थिति विति के अन्दर सिद्धकर अब उसे कालतः सूचित करत…
- Verse 4इसमें अहय्' इस सवेतनाथ के त्याग द्वारा ही सचेतन ओर अचेतन दोनों अंशों के त्याग की प्रिद्ध…
- Verse 5जल स्रे पूर्ण दूध का जल नष्ट हो जाने पर भी जो रूप शेष रहता है उरी के समान दुग्हारा अनुपम…
- Verse 6हे विद्याधर, यह अहंपदार्थ बिलकुल नहीं है, यों अहंकार का त्यागकर यदि तुम्हारा चिद्रूप चिति…
- Verses 7–8सुर और असुरो से व्याप्त पाताल, पृथिवी और स्वर्ग की नाई स्थित एवं प्रीति, हर्ष, क्रोध, युद…
- Verse 9अचेतन या चेतन (मिथ्या जगद्रूप या परमार्थ सद्ब्रह्मरूप) जो ही अपने-आप चिति में चित्रित होत…
- Verse 10से मरुस्थल का ज्ञान न रखनेवालों को तट के इधर ही रोक रखती हैं, जिन महापुरुषों को मरुस्थल क…
- Verse 11अज्नानिर्यो को तो बाधा पहुँचाती ही है, इस आशय से कहते हैं / तिमिर रोग से आक्रान्त नेत्रों…
- Verse 12मरुस्थल में सूर्य की किरणों की नाई यह जो ऊपर का दृृष्टान्त बतलाया गया है उसका दूसरी रीति…