Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 9, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 9, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
चिच्चमत्कृतयो व्योम्नि स्फुरन्त्येता जगत्तया ।
अर्कांशुवदरोधिन्यः स्वच्छा विदितवेदिनाम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
से मरुस्थल का ज्ञान न रखनेवालों को तट के इधर ही रोक रखती हैं, जिन महापुरुषों को मरुस्थल
का असली ज्ञान हो चुका है उन्हें नहीं । उन्हें तो स्वच्छ भासती हैं; वैसे ही एक के विज्ञान से तत्त्वतः
सबका विज्ञान हो जाने पर तत्त्वज्ञानियों को, चिदाकाश में स्फुरित हो रही ये चिति की चमत्कृतियाँ
कुछ भी बाधा नहीं पहुँचाती । उन्हे तो बिलकुल स्वच्छ मालूम पड़ती हैं, किन्तु अज्ञानियों को तो
अवश्य ही बाधा पहुँचाती हैं