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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 9, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 9, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

एवं जगत्त्वमहमित्यवबोधरूपमाभासमात्रमुदितं न च नोदितं च । अर्कांशुजालरचनानगराभमत्र कुड्यादि सत्यमिदमस्ति न खे लतेव ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

मरुस्थल में सूर्य की किरणों की नाई यह जो ऊपर का दृृष्टान्त बतलाया गया है उसका दूसरी रीति से भी वर्णन करते हुए उपरसंहार करते हैं । हे विद्याधर, यों “तुम और भ" इत्याकरक अवबोधस्वरूप यह जगत्‌ आभासमात्र यानी पूर्ववर्णित चिति का एकमात्र चमत्कार ही है, अतः यह अज्ञानियों की दृष्टि से ही उत्पन्न हुआ है, ज्ञानियों की दृष्टि से नहीं । एकमात्र सूर्य की किरणों से जिसकी रचना हुई है ऐसे गन्धर्वनगर के समान इस व्यवहारभूमि में दीवारआदि जगत्‌ है । जगद्रूप से तो यह सब आकाश में लता की नाई बिलकुल सत्य नहीं है। (अतः यह जग्रत्‌ चिति का निरोधक नहीं है / हे विद्याधर, मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि इस तरह विति की अपरिच्छिन्नता प्रिद्ध हो चुकी हैं)