Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 9, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 9, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
भुशुण्ड उवाच ।
अबुद्ध्यमानश्चेत्यादिचिद्रूपमपि चानघ ।
शान्तचिद्धन एवास्व निर्मलाप्स्वन्तरंशुवत् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
हिग्नीव कटकादित्वं संग्रारोदरकोटर: ' / विच्चमत्कार एवायमविकल्यन संक्षय: ॥ /नि.प्र. उत्त,
सर्ग ८/२१/ यह जो कहा यया हैं सो. इन दोनों का अनुभव कराने की इच्छा कर रहे थरुशुण्डजी
अविकल्प की रीति का सबसे पहले उपदेश दे रहे हैं /
हे निष्पाप विद्याधर, विषयों तथा विषयों में रहनेवाले क्रिया, गुण, दोष आदि के प्रकाशक
चिद्रूप का तनिक भी स्मरण न करते हुए तुम निर्मल जल में प्रविष्ट सूर्य की किरणों की नाईं सर्वविध
तापशून्य प्रकाशमात्रावशेष होकर बैठे रहो
सर्ग सन्दर्भ
आठवाँ सर्ग समाप्त नौवोँ सर्ग चिति के अधीन जगत् का उदय, ध्वंस, सत्ता, स्फूर्तिं तथा परिवर्तन है ओर यह सारा विश्व चिन्मात्र चिति का स्फुरण है - यह वर्णन ।