Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 9, Verses 7–8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 9, verses 7–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 7,8
संस्कृत श्लोक
ससुरासुरपातालभूविष्टपमिवोषितम् ।
नानाभावाजवीभावक्रियाकालमिवाकुलम् ॥ ७ ॥
यथा रङ्गमयं कुड्ये जगन्मौनमिव स्थितम् ।
तथा चिच्चित्रकचितं खे कुड्ये चात्मसंस्थितम् ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
सुर और असुरो से व्याप्त पाताल, पृथिवी और स्वर्ग की नाई स्थित एवं प्रीति, हर्ष, क्रोध, युद्ध,
जय, पराजय आदि नाना भावों से तथा पलायन, अनुधावन आदि अत्यन्त वेगपूर्वक दौड़ने आदि
भावों से व्याप्त तत्-तत् अनुरूप क्रियाकाल से व्याकुल हुआ-सा रंगमय चित्र में लिखित जगत्,
दीवार में लिखित मुनिशरीर की नाई, जैसे व्यापारशून्य ही स्थित रहता है वैसे ही मायाशबल
चितिरूपी चित्रकार के द्वारा विरचित यह जगद्रूपी चित्र भी शुद्ध चिदाकाशरूपी दीवार में विकारशून्य
अद्रयात्मरूप से ही संस्थित है, जगत्भाव से नहीं