Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 9, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 9, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
नाहमस्तीति चिद्रूपं चिति विश्रान्तिरस्तु ते ।
ततो यथा यादृशेन भूयते तादृशो भव ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
इसमें अहय्' इस सवेतनाथ के त्याग द्वारा ही सचेतन ओर अचेतन दोनों अंशों के त्याग की
प्रिद्धि हो जाने से चिन्मात्र की अवस्थिति सिद्ध हो जाती है, यह कहते हैं ।
अहम्पदार्थ कुछ नहीं है, यों अहंकार के आस्पद अंश का बाध करके प्रत्यक् चिद्रूप को शेष
रखकर विकल्प के हेतुओं के क्षय से ही विकल्पनिर्मुक्त पूर्णचिति में तुम्हारी विश्रान्ति हो जाय । शेष
बचे प्रारब्ध का क्षय होने पर तो जिस रूप से स्थित रह सकते हो, उसी रूप से तुम स्थित रहो