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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 76

पचहत्तरवाँ सर्ग समाप्त छिहत्तरवाँ सर्ग पश्चिम दिशा में, ऊपर के भाग में पुष्करावर्तक (प्रलयमेघ) का उदय तथा आग्नेय दिशा में उपसंहार-यह वर्णन ।

32 verse-groups

  1. Verses 1–5महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, तदनन्तर जब पर्वतों को कम्पित कर देनेवाला तथा समुद्रतरगों क…
  2. Verse 6यद्यपि उनकी वह ध्वनि दूर से वैसी सुन पड़ती थी, लेकिन वस्तुतः वह अत्यन्त भयंकर थी, ब्रह्मा…
  3. Verse 7लोक, समुद्र एवं नगरों में प्रतिध्वनि के रूप से उत्पन्न घन कोलाहलो के कारण वह सही नहीं जा…
  4. Verse 8भद्र, उस शब्द ने समस्त ब्रह्याण्डरूपी शंख के उदर को भर दिया था, मरनेपर ब्रह्माण्डभित्तियो…
  5. Verse 9दूर-दूर की सम्पूर्ण दिशारूपी असीम भित्तियों को वह ध्वनि रूप शब्द लीला से लेखन द्वारा मानो…
  6. Verse 10वह ध्वनि क्या थी, विजय पाने के लिए प्रस्थान किये हुए महाप्रलय नामक इन्द्र के मत्त ऐरावत ह…
  7. Verse 11महाप्रलय के कारण विक्षुब्ध हुए क्षीरसागर के मंथन का वह भयानक शब्द था, ब्रह्माण्डरूप जो मह…
  8. Verse 12श्रीरामजी, वर्णित मेघध्वनि मैंने सुनी, सुनने के बाद मैं आश्चर्य के मारे चकित हो गया ओर आश…
  9. Verse 13मैंने उन दिशाओं में मेघ नहीं देखे, किन्तु केवल यही देखा कि उनमें तरल एवं आस्फालित उल्मुकर…
  10. Verse 14उस अग्नि के ताप से दसों दिशाओं में भी अनेक करोड़ों योजन दूर तक के सारे पदार्थ भस्म हो रहे…
  11. Verse 15तदनन्तर मेने क्षणभर में अतिदूर आकाश में ऊपर से शीतल वायु का और नीचे अग्नि के सदृश गरम वाय…
  12. Verse 16आकाशमार्ग में वे मेघ इतने दूर प्रदेश में स्थित थे कि उस प्रदेश में न तो नीचे के अग्निताप…
  13. Verse 17तदनन्तर पश्चिम दिशा से कल्प की वायु बहने लगी, उस वायु से विन्ध्य, मेरु, हिमालय आदि बड़े-ब…
  14. Verse 18उस वायु के द्वारा अगल-बगल उड़ रहे अंगाररूपी पक्षियों से युक्त ज्वालारूपी पर्वत आग्नेय दिश…
  15. Verse 19आकाश मण्डल में सन्ध्या काल के अभ्रं के सदृश आकारवाले अंगाररूपी मेघ बरस रहे थे तथा उसमें भ…
  16. Verse 20भद्र, वह अग्निज्वाला के साथ विलासकारी वह दुष्ट वायु अग्निदिशा की ओर ऐसे जाता था जैसे पंखस…
  17. Verse 21श्रीरामजी, जब अतिविस्तृत भूमण्डल ज्वालारहित अंगारों का ढेर बन गया, तथा ज्वाला की पंक्तियो…
  18. Verse 22जब समुद्र अग्निरूपी जल से लबालब तथा काढे के सदृश उछलते हुए जल से पूर्ण हो गये और सारे जंग…
  19. Verse 23जब भार्या, बालक एवं वृद्धो के साथ ब्रह्मलोकस्थ अधिपति तथा ब्रह्मलोक के नगर जलकर आकाश में…
  20. Verses 24–26भद्र, कल्पान्त की अग्नि एक तरह से कमलिनी ही प्रतीत हो रही थी, उसकी ज्वालाएँ ही पल्लवां की…
  21. Verse 27भद्र, वह जो मेघमण्डल आया, वह सुस्थिर कल्पान्त की अग्नि की ज्वालाओं के सदृश अतिभयानक विद्य…
  22. Verse 28समस्त दिशाओं के तट भासुर नीहारसमुहों से छिद्ररहित भित्तियों के सदुश मालूम पड़ रहे थे, वह…
  23. Verse 29उस मेघ को देखकर यही कहना पड़ता था कि कल्पान्त से क्षुब्ध होकर समुद्र ही आकाश में आ धमका ह…
  24. Verse 30उसे देखकर यह भी मालूम पड़ रहा था कि मृत या दग्ध चन्द्रमा ही परलोक में जाकर पुनः पहले की अ…
  25. Verse 31सुवर्ण के समूह के सदृश विद्युत-समूहों का रूप धर लेने के कारण वह उस हिमालय का मानों स्वरूप…
  26. Verse 32श्रीरामजी, तदनन्तर वर्षा होने लगी, इसने समस्त आकाशमण्डल को ब्रह्माण्ड के विस्फोट के सदृश…
  27. Verse 33भद्र, यह वृष्टि अग्निदाह के सदृश वन तथा आकाशमण्डल मे विद्युत के प्रकाश से अतिभीषण लग रही…
  28. Verse 34उत्पन्न हुए अनेक महान्‌ सीत्कार के सैकड़ों शब्दां से उसने सिंहनाद के शब्दां को भी मात कर…
  29. Verse 35भद्र, पृथ्वी एवं आकाशरूप मण्डप के लिए निर्मित वैदूर्यमणि के (लहसुनियों के) स्तम्भो के समू…
  30. Verse 36पृथ्वी को चट-चट शब्द के साथ विदारित करने के कारण उसने अंगारों के समूह भी फोड़ दिये थे । ग…
  31. Verses 37–38भद्र, तदनन्तर अंगारों से युक्त जगत्‌-रूपी घर मेँ विलास करती हुई वह वृष्टि वाष्पशोभा की सख…
  32. Verse 39भद्र, वह गगनमण्डल, जो कि ज्वालाओं के खण्डो के विलासो से भरा था, उस समय ऐसा मालूम पड़ने लग…