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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 76, Verses 24–26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 76, verses 24–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 76 · श्लोक 24-26

संस्कृत श्लोक

कल्पान्तानलपद्मिन्या ब्रह्माग्रावसरोवरे । ज्वालापल्लवशालिन्याः सबीजायाः सटोल्मुकैः ॥ २४ ॥ अनिलात्मसु मूलेषु नागेषु च नगेषु च । आपातालं निमग्नेषु महत्यङ्गारकर्दमे ॥ २५ ॥ उष्ट्रसैन्यमिवालक्ष्य गतिमन्निकटं नभः । आययावञ्जनश्यामः कल्पाम्बुदगणः क्वणन् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, कल्पान्त की अग्नि एक तरह से कमलिनी ही प्रतीत हो रही थी, उसकी ज्वालाएँ ही पल्लवां की शोभा धारण कर रही थीं, पत्थरों से शून्य ब्रह्माण्डरूपी सरोवर ही उसका उत्पत्तिस्थान था, इस तरह की बीजयुक्त कमलिनी के केसर सदृश चिनगारियों से घटित उल्मुकं के द्वारा जब वायुरूप यानी वायुप्रधान साँप एवं पर्वतरूप मूल पाताल पर्यन्त अंगाररूपी कीचड़ में फेस गये, तब मशक में जल ढोने वाली ऊँटों की सेना के सदृश विस्पष्ट (शीघ्र) संचरणशील आकाश को देखकर कल्पान्त के मेघ, जो काजल के सदृश काले-काले थे, गरजते निकट आ धमके