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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 76, Verse 39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 76, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 76 · श्लोक 39

संस्कृत श्लोक

उद्यद्बृहच्चटचटारवपूरिताशो भीमोऽभवत्सलिलदानलसंनिपातः । दुर्वारवैरिविषमो महतां बलानां संग्राम उग्र इव हेतिहतोग्रहेतिः ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, वह गगनमण्डल, जो कि ज्वालाओं के खण्डो के विलासो से भरा था, उस समय ऐसा मालूम पड़ने लगा, जैसे कि उसमें स्थल-कमलों के अनेक समूह उगे हुए हो तथा उस आकाश मण्डल में स्फुरित हो रहे, शीतल जलकणरूप पंखों के समूहों से युक्त मेघ ऐसे मालूम पड़ने लगे थे, जैसे कि ज्वालाओं में घुम रहीं भ्रमर पंक्तियाँ हों ॥३ ८॥ श्रीरामजी, उस समय बड़े भयंकर चटचट शब्दों से दिशाओं को भर देनेवाला जो मेघो ओर अग्नियों का समागम हुआ, वह एक दुसरे से पराजित न हो सकनेवाले वैरियों के विषम-अतएव महान्‌ उग्र, कुशल सेनाओं के परस्पर तीक्ष्ण शस्त्रास्त्रों से विनाशित उग्र शब्त्रयुक्त यानी परस्पर घात-प्रतिघातयुक्त-संग्राम के सदुश अति भयंकर लगता था