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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 66

पैंसठवाँ सर्ग समाप्त छासठवाँ सर्ग अपनी स्थिति और अपना घर तुमने अवकाशरहित शिला के पेट में कैसे किया, इस प्रकार पूछी गई विद्याधरी द्वारा जगत्‌ के विस्तार का वर्णन।

24 verse-groups

  1. Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामचन्द्रजी, वह ब्रह्माण्ड के पूर्ववर्णित उर्ध्व आकाश म…
  2. Verse 2मैंने पूछा कि हे बाले, बिल्कुल अवकाश से रहित शिलापेट में तुम्हारे जैसे शरीरधारियों की स्थ…
  3. Verse 3आपने जितने की अर्नंभावना की हैं, उतना ही उसमें हैं, यह बात नहीं हैं, किन्तु ऐसा दूसरा श्र…
  4. Verse 4वहाँ भी पाताल में नाग रहते हैं । पृथ्वी पर पर्वत स्थित है, जल भी लबालब भरें हैं और आकाश म…
  5. Verse 5उसके भीतर यहाँ के जैसे ही - जल से समुद्र सुशोभित है, प्रजावर्ग भी धीरे-धीरे गमन आदि व्यवह…
  6. Verse 6यहाँ के समान ही वहाँ पर भी वायु चलती है, जल बहते हैं, आकाश में नक्षत्र आदि के रूपों में त…
  7. Verse 7वहाँ देवता, असुर ओर मनुष्यों की चंचल व्यवहारपरंपरा यहाँ के सदुश कल्पतक उस तरह विद्यमान रह…
  8. Verse 8भूलोकरूपी तालतल में कल्पपर्यन्त ओर आकाश तक रहनेवाले दिनरूपी कमल भी यहाँ हुए हैं, दिनरूप क…
  9. Verse 9जैसा कि इस जगत्‌ में है, ठीक वैसा ही उस जगत्‌ में भी चन्द्रमा अपनी ज्योत्सनारूपी चन्दन से…
  10. Verse 10वहाँ भी सूर्य नाम की दीपिका, जो कि दसों दिशारूपी वृत्तियों का स्वाद लेने में (यानी द्रवात…
  11. Verses 11–12द्ावायुथ्वी का अब घूम रहे नक्षत्रमण्डल के कारण घरटूट के स्वरूप से वर्णन करती है / आकाशमण्…
  12. Verse 13वहाँ पर भी यहाँ के सदश ही पृथ्वी आदि लोक द्वीप, पर्वत आदि से भरे हैं; यह कहती हैं / वहाँ…
  13. Verse 14वहाँ पर भी नीला भूतलमण्डल स्थित है । वह ठीक आचरणों से चंचल त्रिजगतिरूप लक्ष्मी का चमक रहे…
  14. Verse 15वहाँ पर स्थावर जंगमात्मक प्राणियों का दल-बुद्धि आदि से शून्य बाह्य वायु की क्रिया के सदृश…
  15. Verse 16वहाँ पर भी यहाँ के सदृश मुनि लोगों का मुनिक्रियाओं ने, पृथ्वी का समुद्र आदि जलोंने, वायुओ…
  16. Verse 17वहाँ पर भी जनम और मरण के भागी बन्दर आदि वृक्षचर, मनुष्य आदि भूचर, मत्स्य आदि जलचर, मृग आद…
  17. Verse 18पशुपालक अपने पशुओं को
  18. Verse 19अनन्त, अगाध, पुष्कल एवं गम्भीर कालरूपी महासागर में आवर्तं ओर विवर्तरूप कालगति से वे सुरास…
  19. Verse 20जिसमें सभी वस्तुओं का विनाश हो जाता है, ऐसे अव्याकृत आकाश में वायु से उड़ाये गये चौदह प्र…
  20. Verse 21यहाँ के सदृश वहाँ पर भी दयु शुभ्र आकाशरूप वस्त्र धारणकर तथा मस्तक में कल्पपर्यन्त तारों क…
  21. Verse 22वहाँ पर भी यहाँ की नाई स्थावर प्राणियों के सदृश पवन, भूकम्प, वृष्टि ओर धूप सहनेवाली दिशाए…
  22. Verse 23ज्योतिषियों द्वारा ओर अन्यां द्वारा अज्ञात उत्पात के हेतु मेच, विद्युत्पतन, भूकम्प तथा ग्…
  23. Verse 24जैसे चौदह भुवनो के प्राणियों को काल कल्प तक पीता है, वैसे ही वहाँ भी सात समुद्रो का जल जल…
  24. Verse 25कथित सब वार्ता का संक्षेप से उपसंहार करते हैं / वहाँ पर भी पातालयोग्य प्राणी पाताल में प्…