Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 66, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 66, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 66 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथेत्युक्तवती पृष्टा सा मया कल्पितासना ।
संकल्पितासनस्थेन स्थितेन नभसि स्थिता ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामचन्द्रजी, वह ब्रह्माण्ड के पूर्ववर्णित उर्ध्व आकाश में
स्थित तथा कल्पित आसन पर बैठी हुई थी, जिसने अपना वर्णित वृतान्त कहा, फिर प्रश्न
किया
सर्ग सन्दर्भ
पैंसठवाँ सर्ग समाप्त छासठवाँ सर्ग अपनी स्थिति और अपना घर तुमने अवकाशरहित शिला के पेट में कैसे किया, इस प्रकार पूछी गई विद्याधरी द्वारा जगत् के विस्तार का वर्णन।