Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 66, Verses 11–12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 66, verses 11–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 66 · श्लोक 11,12
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मसंकल्पितो रुद्धो वातसंचारचारिभिः ।
खेऽनिशं चक्रमृक्षाणां गुणावर्तो विवर्तते ॥ ११ ॥
भूततण्डुलमासृष्टेः पिनष्टि ध्रुवकीलकः ।
नियत्या चलितो रोदः कपाटाम्भोदघर्घरः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
द्ावायुथ्वी का अब घूम रहे नक्षत्रमण्डल के कारण घरटूट के स्वरूप से वर्णन करती है /
आकाशमण्डल में वहाँ पर भी नक्षत्रों का चक्ररूप घरट्ट (चक्की) घूमता है । ओर अण्डज
आदि चार प्रकार के भूतो को, जो एक तरह से चावलरूप है, सृष्टि के आरम्भ से लेकर बराबर
पीसती रहती है, यह घरट्ट यन्त्र ब्रह्मा ने अपने संकल्प से बनाया है, वायुसंचारचारियों से यानी
वातरश्मियों से यह अवष्टब्ध है, ध्रुवरूप खूँटे से ऊपर थमा हुआ है तथा अन्तरिक्ष एवं पृथ्वी में
कपाट के सदृश बन्द करने ओर खोलने का स्वभाव रखनेवाले मेघो से घर्घर ध्वनि करता रहता
है, यह नियति से संचालित है