Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 66, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 66, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 66 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
पातालमाविशति याति नभोबिलं च दिङ्मण्डलं भ्रमति भूतगणः समन्तात् ।
पर्येति पर्वतमहार्णवमण्डलानि द्वीपान्तराणि च मरुत्सरणक्रमेण ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
कथित सब वार्ता का संक्षेप से उपसंहार करते हैं /
वहाँ पर भी पातालयोग्य प्राणी पाताल में प्रवेश करता है, आकाशबिल में विलास करने
योग्य प्राणी आकाश में जाता है, दिशाओं में भ्रमण करने योग्य प्राणी दिशाओं में भ्रमण करता
है । संक्षेप से चारों ओर प्राणी समूह वायु के संचार के सदृश, पर्वत, महासमुद्र मण्डल तथा
अन्यान्य द्वीपान्तरों में भ्रमण करते हैं, इसलिए यहाँ जितना व्यवहार है, वह सब वहाँ पाषाण
की शिला में भी है, यह आप जानिये