Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 66, Verse 6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 66, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 66 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
वान्ति वाता वहन्त्यापो भान्ति चाभान्ति खे सुराः ।
तिष्ठन्त्यगाः समुद्यन्ति ग्रहा यान्ति महीं नृपाः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
यहाँ के
समान ही वहाँ पर भी वायु चलती है, जल बहते हैं, आकाश में नक्षत्र आदि के रूपों में तथा अपने-
अपने शरीर आदि के रूप में देवता भासते हैं । पर्वत स्थित हैं, गुणों का उदय होता है और पृथ्वी
में राजे भी चलते-फिरते हैं