Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 61
साठवाँ सर्ग समाप्त ड्कसठवाँ सर्ग कल्पान्त में जगत् का नाश होने पर भी अज्ञात ब्रह्मका हृदय जगत् अविनाशी है, ब्रह्म का ज्ञान हो जानेपर तो तीनों काल में जगत की सत्ता ही नहीं रहती ।
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- Verse 1अनादि अविद्या के कारण अज्ञात हुआ ब्रह्म ही अपने असली कूटस्थ पू्णानिन्द स्वभाव को भूलकर य…
- Verse 2वे ही मन अपने अन्दर रहने वाली योग्य कासना.ओ को जगद् के आकार मे विकामित करने के कारण अनन्…
- Verse 3इन सब बातें से निष्कर्ष यही निकला कि अपनी अविद्या से अकेला ब्रह्म ही अनेक जीवों के आकारो…
- Verse 4प्रश्न का अनुवाद कर यद्य और दयो से उसका उत्तर देने के लिए महाराज वस्तिष्ठजी प्रतिज्ञा करत…
- Verse 5गद्यभाग से जिस अर्थ की चिद्धि की गहै उस अर्थ का अब पद्य से उपसंहार करते हैं / हे श्रीरामज…
- Verse 6जगत् का विनाश नहीं होता, इसमें दूसरी युक्ति बतलाते हैं / जो असंख्य बड़े से बड़े आकाशतक क…
- Verse 7यह जगत् उस महाचिति का शरीर है, महाचिति तो नष्ट होती नहीं, इसलिए उसके विनाश के बिना जगत्…
- Verse 8जयत् संवित् का हृद्य हैं, यह तो स्वप्न में भी, जिसका सार ज्ञानभाव है, प्रस्तिद्ध हैं; य…
- Verse 9भद्र, यह सृष्टि चिदाकाश का काल्पनिक अवयव (अंग) है ओर अंगभूत कल्पित इस सृष्टि के उदय तथा क…
- Verse 10यह जो परमार्थ ज्ञानरूप आत्मा है, वह काटने के अयोग्य है । वह परमार्थ चिति (ब्रह्म) अज्ञानि…
- Verse 11जयत् की आत्मा भी अविनाशी आत्मा को लेकर ही है इससे भी जग्रत् विनश्वर नहीं है, यह कहते है…
- Verse 12यदि शंका हो कि ब्रह्मरूप विश्व है, तब तो ब्रह्म भी अनेक तरह का होना चाहिए, क्योकि विश्व अ…
- Verse 13यदि शका हो कि सृष्टि, प्रलय आदि अकतख्य अचेतन अवयवो से युक्त आत्या विशुद्ध विदेकरस कसे हो…
- Verse 14जैसे स्फटिक में पड़े हुए चित्र-विचित्र प्रतिबिम्ब स्फटिक रूप से ही स्थित है, वैसे ही इस स…
- Verse 15जैसे मन के स्रंकल्प से जनित यक्षनगरर आदि केवल मनोरुप हैं; वैसे ही विशुद्ध बिति के सकल्य स…
- Verse 16यह कव तो ठीक हैं, परंतु प्रश्न यह उठता है कि जगत् अविनाशी कैसे 2 इसका उत्तर यह है -अविना…
- Verse 17द्व्य और अदृश्य का भेद कैसे हैं 2 इस पर कहते है/ निरन्तर ही एकस्वरूपवाले अवयव और अवयवियों…
- Verse 18अवयव और अवयवी के अभेद का, वृक्ष और वर्ष के अवयवो की समानता बतलाकर,निरुपण करते हैं / जैसे…
- Verse 19इसी अर्थ को कहते हैं। भद्र, जितने भविष्यकाल के पदार्थ हैं , जितने भूतकाल के पदार्थ हैं,जि…
- Verse 20तब क्या ब्रह्म मे कल्पित सृष्टि, प्रलय आदि सत्य हैं ? इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर देते ह…
- Verse 21श्रीरामजी, सम्पूर्ण मलों से रहित परम चिदाकाश में कहाँ सृष्टि-प्रलय के कलंक, कहाँ आदि, मध्…
- Verse 22तब उल प्रकार के विश्रम में कोन हेतु है ओर उसकी शान्ति कैसे होती हैं, इस पर कहते हैं । आत्…
- Verse 23जो आत्मा के अज्ञान का साधक हैं. वह जब चरम (अन्तिम) आत्मम्राक्षात्कार वृत्ति थे प्रकाशित ह…
- Verse 24ज्ञान, अज्ञान ओर अज्ञान के कार्य का निवर्तक है, यह कहते हैं । अज्ञान भलीभाँति परिज्ञात हो…
- Verse 25हे रामजी, मोक्ष के लिए ये ही वर्णित बोध आदि उपाय मैंने आपसे बतलाये । जिस पुरुष का सतत प्र…
- Verse 26श्रीरामजी, यह अनादि जगत्-रूपी जाल कभी उत्पन्न हुआ ही नहीं है परन्तु जो यह कुछ वर्णित जीव…