Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 61, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 61, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
यदि शका हो कि सृष्टि, प्रलय आदि अकतख्य अचेतन अवयवो से युक्त आत्या विशुद्ध विदेकरस
कसे हो सकता है, तो यह शका योग्य नहीं हैं, क्योकि वृक्ष नगर आदि अनेक ग्रतिबिस्बों से युक्त
स्फटिकशिला जैसे विशुद्ध विदेकरसरूय हो सकती है, इस आशय से उत्तर देते हैं
चिन्मात्र परम ब्रह्मरूप आकाश में किस हेतु से सृष्टि और प्रलय हो सकते हैं तथा किस हेतु से
किस तरह भावविकार आदि धर्म भी निराकार चिदाकाश में हो सकते हैं अर्थात् किसी तरह भी नहीं
हो सकते