Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 61, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 61, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
अनादि अविद्या के कारण अज्ञात हुआ ब्रह्म ही अपने असली कूटस्थ पू्णानिन्द स्वभाव को
भूलकर यह कल्पना करता है कि मैं चलनस्वभाव, स्वल्पस्वभाव आविरुप हूँ. इस तरह की
कल्पना कर मन, प्राण आदि के क्रम से भोकतार॒प और भोग्यरूप होकर चदा छव तरह से
उत्तरोत्तर संग्रारी ही बनता जाता है इसलिए जब तक अविद्या है, तब तक ससार की स्थिति सदा
ही बनी रहेगी / यदि शार ओर आचार्य के उपदेश से ब्रह्म का ज्ञान हो जाता है, तब तो वह सदा,
सव ओर से तथा सी प्रकार से पूर्णानन्द विदेकरसमात्ररूप ही बन जाता है, इसलिए किसी समय
कहीं पर, कड भी ओर किसी व्यक्ति में भी ससार की संभावना नहीं की जा सकती, अतः ब्रह्म
नित्ययुक्त स्वभाव ही हैं, यह बतलाने के लिए महाराज वस्तिष्ठजी भूमिका कोधते हैं /
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, जैसे जल में जल से ही जलरूप वेग-तरंग आदि स्फुरित
होते हैँ वैसे ही चिदाकाश में चिदाकाश से ही ये सब-अज्ञात आत्मा के स्वभाव से प्राण आदि
उपाधियों से परिच्छिन्न -जीव स्फुरित होते हैं, और वे ही जीव उत्तरोत्तर हजारों संकल्प-विकल्पों
के कारण संसार के बीजरूप होकर कारण बन जाते हैं, और हम लोगों के मन कहे जाते हैं
सर्ग सन्दर्भ
साठवाँ सर्ग समाप्त ड्कसठवाँ सर्ग कल्पान्त में जगत् का नाश होने पर भी अज्ञात ब्रह्मका हृदय जगत् अविनाशी है, ब्रह्म का ज्ञान हो जानेपर तो तीनों काल में जगत की सत्ता ही नहीं रहती ।